इक्कीसवीं सदी के इस 'विदेहराज' से मिलिए
नई दिल्ली, अगस्त 1 -- किसी बड़े दार्शनिक ने कहा है- गरीब वह नहीं, जिसके पास रुपये-पैसे नहीं; गरीब वह है, जिसकी आंखें सपनों से खाली हैं! यह आचरण का दर्शन है। अपने आस-पास, कस्बे-जनपद में ही नजर घुमाएं, तो ऐसे अनेक लोग दिख जाते हैं, जिन्होंने ख्वाब देखे, उनकी तामीर में खुद को झोंक दिया और बेमिसाल बन गए। इनमें से कई तो ऐसे हैं, जिनके पास बड़ी डिग्रियां नहीं, मगर विश्वविद्यालयों ने उन पर नाज किया, जमाने को उनसे रश्क हुआ! आज एक ऐसे ही शख्स विवेक शंगारी की दास्तान, जिनकी दरियादिली के आगे कई अरबपति भी बौने नजर आते हैं। आज से करीब पचास साल पहले छत्तीसगढ़ (तब मध्य प्रदेश) के भिलाई शहर में जन्मे विवेक महज चार साल के थे, जब मां चल बसीं। यह एक ऐसा दर्द था, जिसे खुद विवेक भी अब बयां नहीं कर सकते। दुनिया का कोई शख्स, कोई साहित्यकार इसे दर्ज नहीं कर सकता...
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