नई दिल्ली, मई 23 -- वर्ष 1576। राणा प्रताप हल्दी घाटी की लड़ाई हारकर मुट्ठी भर भरोसेमंदों के साथ जंगलों में भटक रहे थे। सिसौदियों के दुर्गों पर अब मुगल ध्वज लहरा रहे थे और समूचे राजपूताने का मनोबल चूर-चूर हो चुका था। निराशा के उस गहन गर्त में दो बरस बाद अचानक उम्मीद की किरणें फूटती नजर आईं। राज्य के कोषाध्यक्ष भामाशाह के भाई ताराचंद ने रावतभाटा के घने जंगलों में गुम गांव चूलिया में राणा प्रताप से मुलाकात की। उन्होंने पीढ़ियों से संचित पारिवारिक धन राणा के चरणों में रख दिया। यह रकम इतनी अधिक थी कि इससे 25 हजार सैनिकों का 12 वर्षों तक भरण-पोषण किया जा सकता था। राणा लड़ाई हारे थे, मनोबल नहीं। इसी धन से उन्होंने दोबारा सेना खड़ी की और देखते-देखते लुटे हुए राज्य का अधिकतर हिस्सा फिर से हासिल कर लिया। किसी परिकथा जैसी सम्मोहक इस कहानी में गहरा सबक...