पाकुड़, मार्च 31 -- महेशपुर। प्रखंड के काठशल्ला गांव के तरूण पाल आधुनिकता के दौड़ में भी वर्षों पुरानी परंपरा के सहारे परिवार का भरण-पोषण में जुटे हैं। तरुण पाल बताते हैं कि उनके पास न तो दुकान है और न ही बाजार में कोई निर्धारित स्थान। वे अपने घर के सामने मुख्य सड़क किनारे ही मिट्टी से बने बर्तनों को सजा कर रखते हैं। बरसात में यह काम और कठिन हो जाता है। धूप-बारिश, धूल और यातायात के बीच परिवार के सदस्य सुबह से शाम तक ग्राहकों की प्रतीक्षा करते हैं। इतना ही नहीं, वे आसपास के चाय दुकानदारों तक खुद जाकर मिट्टी का बना कुल्हड़ पहुंचाते हैं, ताकि उनकी बिक्री बनी रहे। मिट्टी के बर्तनों का इतिहास भारतीय सभ्यता जितना पुराना है। पुराने समय से मिट्टी के बर्तन घरेलू जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। गांवों में घड़ा, सुराही, दीया, हांडी और कुल्हड़ का प्रयो...
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