गिरडीह, मई 30 -- पीरटांड़। जैन दर्शन विश्व का एकमात्र ऐसा दर्शन है जो आत्मा की अनंत शक्ति और स्वतंत्रता में विश्वास रखता है। अप्पासो परमात्मा अर्थात आत्मा ही परमात्मा है। यह जैन धर्म का मूल सिद्धांत है। प्रत्येक आत्मा स्वभाव से शुद्ध, बुद्ध और सिद्ध स्वरूप है। केवल कर्मों के आवरण के कारण उसकी अनंत शक्तियां ढकी हुई है। उक्त बातें मधुबन में साधनारत गुणायतन प्रणेता राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज ने आयोजित प्रवचन सभा में कही। मुनि श्री ने कहा कि जिस प्रकार कोयले से आग बन सकती है, ठीक उसी प्रकार हर आत्मा में परमात्मा बनने की क्षमता विद्यमान होती है। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र के द्वारा कर्मों का क्षय करके, आत्मा की शुद्धि कर जीव परम सिद्ध पद को प्राप्त कर सकता है। मुनि श्री ने तीर्थंकरों के स्पष्ट स्वरूप का वर्णन करते ह...