आज दांव पर रंगमंच का अस्तित्व
नई दिल्ली, अप्रैल 19 -- आज के डिजिटल युग में, जहां मनोरंजन हर व्यक्ति की हथेली पर रखे स्मार्टफोन में सिमट आया है, रंगमंच के अस्तित्व पर प्रश्न-चिह्न लगना हैरानी की बात नहीं है। ओटीटी, यू-ट्यूब और फिल्मी मायाजाल के बीच लाइव थिएटर आज भी अपनी सांसें बचाए हुए है, पर यह स्वीकार करना आवश्यक है कि वह अपनी मूल पहचान और व्यापक पहुंच खोता जा रहा है। विशेषकर प्रोसेनियम थिएटर, जिसे हमने तकनीक और भव्यता के नाम पर अपनाया था, आज हमारे रंगमंच के लिए एक 'स्वर्ण पिंजरा' बन गया है। यह ढांचा, जो कभी भारतीय परंपरा में नहीं था, अब नाटक को आम जनता से दूर ले जा रहा है। ऑडिटोरियम के भारी-भरकम किराये और बढ़ते खर्चों ने टिकटों को इतना महंगा कर दिया है कि निम्न और मध्यम वर्ग के लिए नाटक देखना एक 'लग्जरी' बन गया है। जब रंगमंच केवल 'पैसा फेंक तमाशा देख' की संस्कृति में...
Click here to read full article from source
इस लेख के रीप्रिंट को खरीदने या इस प्रकाशन का पूरा फ़ीड प्राप्त करने के लिए, कृपया
हमे संपर्क करें.