नई दिल्ली, मार्च 8 -- भारतीय राजनीति नए-नए विद्रूप रचने की अभ्यस्त हो चली है। शनिवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने पश्चिम बंगाल में अपने कार्यक्रम से जुड़ी जो टिप्पणी की, उसमें उनकी पीड़ा की अभिव्यक्ति देखने के बजाय राजनीति के बिंदु खोजने की चेष्टा हो रही है और इसकी जितनी भी निंदा की जाए, वह कम है। देश में अब कुछ ही सांविधानिक पद ऐसे हैं, जिनका सम्मान बचा हुआ है और इसे हर हाल में अक्षुण्ण रखा जाना चाहिए। हाशिये के समाज से आने वाली राष्ट्रपति जब पश्चिम बंगाल के बागडोगरा में आयोजित नौवें अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन को संबोधित करने पहुंचीं, तब वहां की अव्यवस्था देखकर उनका निराशा व्यक्त करना लाजिमी था। राज्य की ममता बनर्जी सरकार को इसका तत्काल संज्ञान लेते हुए शालीन व्यवहार का परिचय देना चाहिए था, मगर दोषियों की पहचान और कार्रवाई करने के बज...
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