नई दिल्ली, जून 10 -- हाल ही में पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऐसा घटनाक्रम देखने को मिला, जिसने भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़े नैतिक प्रश्नों को उजागर कर दिया। विधानसभा चुनावों में हार के बाद सत्तारूढ़ दल से जुड़े कुछ जनप्रतिनिधियों के दल छोड़ने और राजनीतिक निष्ठा बदलने की चर्चा ने केवल बंगाल की राजनीति, बल्कि पूरे देश की लोकतांत्रिक संस्कृति को कटघरे में खड़ा कर दिया है। यह घटना कोई अपवाद नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गोवा, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में भी सत्ता परिवर्तन के पीछे वैचारिक संघर्ष कम और राजनीतिक अवसरवाद अधिक दिखाई दिया है। ऐसे समय में, यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या राजनीति अब केवल सत्ता प्राप्ति और संरक्षण का माध्यम बनकर रह गई है, या उसमें अभी भी सिद्धांत, नैतिकता और जनप्रतिबद्धता ज...