मुरादाबाद, फरवरी 18 -- पहला रोजा गुरुवार को है। तहसील इमाम कारी अब्दुल मुईद बताते हैं कि पवित्र कुरआन के तीसवें पारा (अध्याय-30) की सूरे-का़फेरून की आ़खरी आयत में जिक्र है कि तुम तुम्हारे दीन पर रहो, मैं मेरे दीन पर रहूं, चूंकि इस्लाम मज़हब एक अल्लाह को मानता है और हज़रत मोहम्मद को अल्लाह का रसूल स्वीकारता है, इसलिए रोजा मुसलमान पर फर्ज़ की शक्ल में तो है ही, अल्लाह की इबादत का एक तरी़का भी है और सली़का भी। रोज अल्लाह के लिए रखा जाता है। इससे माफी मिलना नामुमकिन है। रोजा रखने का सली़का है, रोज़े की पाकीज़गी और सब्र, सड़क है रोजदार की। दान करना रोजेदार का पुल है। ऐसा पाकीज़ा रोजा रोजदार के लिए दुआ का दऱख्त है, इसीलिए रमजान को सबसे खास महीना माना गया है क्योंकि यह बुराई, झूठ, फरेब से बचाता है।
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