नई दिल्ली, दिसम्बर 13 -- तब एक नदी बान उत्तर प्रदेश के अमरोहा में क्या खूब बहती थी! उस नदी के करीब बैठे-अधलेटे या उसमें पैर गीले किए बीते थे उसके कई दिन। वह ख्वाबों-खयालों में डूबा रहता था और उसके अब्बा भी। उनके लिए शायरी, तारीख, मजहब-ए-आदम, इल्म-ए-हयात और फलसफों का सिलसिला थी जिंदगी। अब्बा लिखते भी रहते थे। अरबी, फारसी, अंग्रेजी, यूनानी और संस्कृत के विद्वान अब्बा ने अपने इस छोटे बेटे में न जाने क्या देखा कि कहा, 'तुम मुझसे एक वादा करो।' बेटे ने हामी भरी, तब अब्बा ने कहा, 'वादा करो कि तुम जब बड़े हो जाओगे, तब मेरी किताबें जरूर छपवाओगे।' अब्बा की आंखों में गहरी उदासी थी। अब्बा ने तालीम को पूरा वक्त दिया था, पर शायद दुनियादारी की जंग में शिकस्त मान बैठे थे। तब बेटे ने कहा, 'हां, मैं वादा करता हूं। जब बड़ा हो जाऊंगा, तो आपकी किताबें जरूर छप...
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