रांची, जुलाई 25 -- रांची, विशेष संवाददाता। झारखंड हाईकोर्ट ने एक 17 वर्षीय किशोरी की अभिरक्षा से जुड़े संवेदनशील मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि अभिरक्षा विवाद में केवल बच्चे की तत्काल इच्छा ही निर्णायक नहीं हो सकती। अदालत का सर्वोच्च दायित्व बच्चे के समग्र कल्याण और सुरक्षित भविष्य को सुनिश्चित करना है। ऐसे मामलों में केवल कानूनी पहलुओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि मानवीय पक्षों पर भी गंभीरता से विचार करना आवश्यक है। अदालत ने दोहराया कि किसी भी अभिरक्षा विवाद में बच्चे का सर्वोत्तम हित ही सर्वोपरि सिद्धांत है।

किशोरी की इच्छा मामले में 17 वर्षीय किशोरी ने अदालत के समक्ष स्पष्ट रूप से कहा कि वह अपनी नानी के साथ ही रहना चाहती है। नानी ने ही बचपन से उसका पालन-पोषण किया, पढ़ाई का खर्च उठाया और मां की तरह उसकी देखभाल की। स...