जमुई, मार्च 2 -- जमुई। कार्यालय संवाददाता एक दशक पहले जब होली निकट आते हैं ढोल की थाप पर फगुआ के गीत सुनाई पड़ने लगे थे। ढोलक की थाप और मजीरों पर फगुआ गीतों से सजने वाली गवई महफिलें जमने लगती थीं। इस गीत के साथ क्षेत्रों में भी फाल्गुन की आहट होती थी। पारंपरिक गीतों से गांव की गलियां-मुहल्ले गूंजते रहते थे। बच्चे-बुजुर्ग सब में होली का उत्साह देखते ही बनता था। कहीं होली खेले रघुवीरा अवध में होली खेले रघुवीरा, किनका हाथ कनक पिचकारी किनका हाथ अबीर झोली तो कहीं जोगिरा सारारारा...। ढोलक व झाल की आवाज सुनते ही लोग सुनने व गाने के लिए दौड़ पड़ते। कभी-कभी इन लोक गीतों में फूहड़ता रहती थी फिर भी लोगों का उत्साह चरम पर होता। न कोई राग-द्वेष होता, न कोई बदसलूकी होती। लोग प्रेम व सौहार्द्र के वातावरण में होली का त्योहार मनाते थे। डीजे के शोर में गुम...
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