देहरादून, मार्च 12 -- कथावाचक आचार्य शिव प्रसाद ममगाईं ने कहा है कि संसार एक समरस्थली है। यहां कभी राम रावण युद्ध होता है तो कभी पांडव कौरव युद्ध। ये सभी महायुद्ध थे, लेकिन इनसे भी बड़ा युद्ध हमारे भीतर निरंतर चल रहा है। इस युद्ध की कर्ता आत्मा है और उसके शत्रु हमारी वासनाएं हैं। डोभालवाला में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन कथा वाचक आचार्य शिवप्रसाद ममगांई ने कहा कि बहुत कम धीर लोग अंतर्मुखी हो कर ही इस युद्ध पर विचार करते है। मनुष्य की इन्द्रियां संसार की विभिन्न वस्तुओं के दर्शन, प्राप्ति, भोग आदि में लिप्त होकर अंतरात्मा की आवाज़ को भूल गई हैं। वे आत्मिक शांति को प्राप्त करने के उद्देश्य की बजाय सांसरिक वस्तुओं के भोग में शांति की खोज करने लगे है। प्राचीन ऋषि मुनियों का देवासुर संग्राम को लेकर गहरा चिंतन था। यही कारण है कि विभिन्न...
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