दुमका, अप्रैल 12 -- सरैयाहाट, प्रतिनिधि।सरैयाहाट-मंडलडीह गांव में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के अन्तिम दिन दिव्या देवी ने कहा कि भागवत कथा एक महासागर है इसमें जो डुबकी लगाता है वह ईश्वर के अधीन हो जाता है। उसके पापकर्म धीरे-धीरे समाप्त होने लगते है। पापकर्म समाप्त होने के साथ ही उसे आनन्द का अनुभव होने लगता है। कथा प्रवचन में कृष्ण और रूक्मिणी विवाह का विस्तार से वर्णन किया। जिससे श्रद्धालु आनंदित हो उठे। कथा के दौरान उन्होंने कहा कि यदि हम सेवा, सुमिरन और संतोष इन तीन स्तंभो को अपने दैनिक व्यवहार में उतार लें, तो यह संसार ही स्वर्ग के समान आनंदमयी बन सकता है। असंतोष ही दुख की जननी है। कहा कि हमें उपलब्ध संसाधनों के लिए ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए। संतोष का अर्थ आलस नहीं, बल्कि जो हमारे पास है उसकी कद्र करना और उसमें सुखी रहना है। भागदौड...
Click here to read full article from source
To read the full article or to get the complete feed from this publication, please
Contact Us.