जमशेदपुर, फरवरी 27 -- झारखंड और आसपास के क्षेत्रों में संताल आदिवासी समाज की ओर से प्रकृति पर्व बाहा हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। बाहा का शाब्दिक अर्थ फूल होता है, जो नए साल के आगमन और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का प्रतीक है। इस पर्व की सबसे विशिष्ट पहचान इसकी पर्यवरण अनुकूल मर्यादित और अनुशासित होली है। संताल समाज में प्रचलित अन्य समुदायों की तरह रंगों और गुलाल का उपयोग पूरी तरह वर्जित है। यहां होली केवल शुद्ध जल से खेली जाती है, लेकिन इसके पीछे के सामाजिक नियम अत्यंत कड़े और दिलचस्प हैं। बाहा पर्व पर संताल समाज के लोग सबसे पहले साल (सखुआ) के फूलों की पारंपरिक विधि-विधान से पूजा करते हैं। इसके बाद ही पानी की होली शुरू होती है। उल्लेखनीय है कि यह पानी की होली भी हर किसी के साथ नहीं खेली जा सकती। संताल परंपरा के अनुसार, यह केवल...