शामली, मई 28 -- शामली। दिगंबर जैन धर्मशाला में प्रवचन करते हुए वाक्ककेसरी आचार्य संत विनिश्चय सागर ने कहा, भाव, संस्कार और मानवता का महत्व आज का मनुष्य भौतिक सुविधाओं और बाहरी प्रगति के पीछे लगातार आगे बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ ही उसके भीतर अशांति, तनाव, क्रोध और स्वार्थ की भावनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। यही कारण है कि समाज में मानसिक तनाव, आपसी दूरी और संघर्ष देखने को मिल रहे हैं। वास्तव में मनुष्य का जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि उसके भावों, विचारों और संस्कारों से चलता है। मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही उसका व्यक्तित्व बनता जाता है। यदि मन में प्रेम, दया, करुणा, सहयोग और सहनशीलता हो, तो जीवन शांत और सुखद बनता है। वहीं ईर्ष्या, अहंकार, क्रोध और दूसरों को नीचा दिखाने की भावना अशांति को जन्म देती है। इसलिए कहा गया है कि जैसे भाव होते हैं, वैस...