मुरादाबाद , जुलाई 03 -- इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के बहुचर्चित रामकुंवर हत्याकांड में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए दोषियों की अपील खारिज कर दी है। करीब 35 वर्ष पुराने इस मामले में अदालत ने दोषियों को 15 दिन के भीतर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।

पीड़ित पक्ष ने शुक्रवार को बताया कि न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने गुरुवार को दिए अपने फैसले में अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों, प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों तथा चिकित्सीय रिपोर्ट को दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त माना। अदालत ने बलिस्टर, महेश और नरेश की अपील खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।

उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि सभी दोषी 15 दिनों के भीतर सीजेएम के समक्ष आत्मसमर्पण करें। ऐसा न करने पर उनके विरुद्ध गैर-जमानती वारंट जारी किया जाएगा।

पीड़ित पक्ष ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि भले ही न्याय मिलने में लंबा समय लगा, लेकिन इस निर्णय से न्यायपालिका पर उनका विश्वास और अधिक मजबूत हुआ है।

उल्लेखनीय है कि 27 सितंबर 1987 की रात थाना कुंदरकी क्षेत्र के बसेड़ा गांव में मंदिर से अखंड रामायण पाठ सुनकर लौट रहे रामकुंवर की पुरानी रंजिश के चलते गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। आरोप है कि हत्या के बाद आरोपियों ने शव को रस्सी से बांधकर घसीटते हुए जंगल में ले जाकर साक्ष्य मिटाने के उद्देश्य से धड़ से सिर अलग कर दिया था। घटना के दौरान हुई फायरिंग में वीरम नामक युवती भी छर्रे लगने से घायल हो गई थी।

पुलिस ने चार अक्टूबर 1987 को गन्ने के खेत से रामकुंवर का धड़ बरामद कर लिया था, जबकि सिर बरामद नहीं हो सका। जांच में सामने आया कि घटना से करीब ढाई वर्ष पहले महेश ने अपनी बहन सुमन को भगाने का आरोप लगाते हुए रामकुंवर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था। अभियोजन के अनुसार इसी रंजिश के चलते हत्या की वारदात को अंजाम दिया गया।

अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने दो मई 1989 को महेश, नरेश और विरपाल को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 तथा बलिस्टर को धारा 302/34 के तहत आजीवन कारावास और अर्थदंड की सजा सुनाई थी। साथ ही उन्हें धारा 201 और धारा 324/34 के तहत भी दोषी ठहराया गया था।

दोषियों ने उच्च न्यायालय में अपील दायर कर प्राथमिकी दर्ज कराने में कथित देरी, गवाहों के मृतक के परिजन होने तथा बयानों में विरोधाभास का हवाला देते हुए बरी किए जाने की मांग की थी। हालांकि उच्च न्यायालय ने इन सभी तर्कों को अस्वीकार करते हुए कहा कि घटना के लगभग साढ़े चार घंटे के भीतर प्राथमिकी दर्ज कर ली गई थी और इसमें किसी प्रकार की मनगढ़ंत कहानी या अनावश्यक विलंब के संकेत नहीं हैं।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि प्रत्यक्षदर्शी गवाहों रोहताश सिंह, खंडेय सिंह सहित अन्य गवाहों के बयान पोस्टमार्टम रिपोर्ट और चिकित्सीय साक्ष्यों से पूरी तरह मेल खाते हैं। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल गवाह के मृतक का रिश्तेदार होने के आधार पर उसकी विश्वसनीय गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता। इन्हीं आधारों पर अदालत ने दोषियों की अपील निरस्त करते हुए उम्रकैद की सजा को यथावत रखा।

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