बैतूल , अगस्त 31 -- मध्यप्रदेश के बैतूल जिले की भीमपुर तहसील के ग्राम आदर्श धनोरा में भुजरिया का त्योहार पूजा और विसर्जन तक सीमित नहीं है। यहां इस अवसर पर 92 साल पुरानी परंपरा के तहत पूरा गांव एक साथ बैठकर वीरगाथा 'आल्हा' का सामूहिक गायन करता है। खास बात यह है कि इसमें सभी समाजों के लोग शामिल होकर वीर रस की गाथा गाते हैं।

गांव के पटेल गणेशसिंह गौतम के अनुसार इस परंपरा की शुरुआत वर्ष 1934 में उनके दादा गंगूसिंह (लंगड़ा) पटेल ने की थी। वह पहली बार आल्हा की किताब गांव में लेकर आए थे। इसके बाद भुजरिया के अवसर पर आल्हा पढ़ने और सामूहिक रूप से गाने की परंपरा शुरू हुई, जो करीब नौ दशक बाद भी उसी उत्साह के साथ जारी है।

भुजरिया के दिन गांव के लोग पटेल के घर पर एकत्र होते हैं और आल्हा का सामूहिक गायन करते हैं। वीर रस से ओत-प्रोत गाथा के दौरान ग्रामीणों में जोश और उत्साह का माहौल रहता है। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी इस परंपरा से जुड़े हैं। तीन पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा अब गांव की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है।

आल्हा गायन के बाद महिलाएं भुजरिया विसर्जन के लिए निकलती हैं। गांव के अलग-अलग घरों में रखी भुजरिया भी सामूहिक जुलूस में शामिल की जाती हैं। ग्रामीण इन्हें एक साथ नदी तक ले जाकर विसर्जित करते हैं।

परंपरा के अनुसार भुजरिया के बाद लोग एक-दूसरे को भुजरिया भेंट करते हैं, बड़े-बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं और एक-दूसरे से गले मिलते हैं। ग्रामीणों के अनुसार यह रस्म आपसी मनमुटाव दूर कर रिश्तों को मजबूत करने का अवसर भी है।

बुंदेलखंड और उत्तर भारत के कई हिस्सों में भुजरिया के अवसर पर आल्हा गाने-सुनने की पुरानी परंपरा रही है। लोक परंपरा और आल्हा खंड की कथा के अनुसार महोबा के वीर योद्धा आल्हा और ऊदल ने राजा परमाल की बेटी चंद्रावलि को धर्म-बहन बनाया था। सावन में चंद्रावलि अपनी सखियों के साथ कीरत सागर में भुजरिया विसर्जन और झूला झूलने पहुंची थीं। इसी दौरान पृथ्वीराज चौहान की सेना ने महोबा पर हमला कर दिया और चंद्रावलि के डोले को घेर लिया।

धर्म-बहन की रक्षा और सम्मान के लिए आल्हा-ऊदल ने सेना से युद्ध किया। लोक परंपरा में इस संघर्ष को 'भुजरियों की लड़ाई' के रूप में याद किया जाता है। इसी वीरगाथा को आल्हा गायन के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया जाता रहा है।

आल्हा की कथा में आल्हा-ऊदल के मित्र सैयद यानी ताला सैयद सहित मुस्लिम योद्धाओं के युद्ध में शामिल होने और बलिदान देने का भी उल्लेख मिलता है। इसलिए इस परंपरा को केवल वीरता की गाथा ही नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और भाईचारे से जोड़कर भी देखा जाता है।

आदर्श धनोरा में अलग-अलग समाजों के ग्रामीणों का एक साथ बैठकर आल्हा गाना इसी विरासत को जीवित रखे हुए है। वर्ष 1934 में एक किताब के साथ शुरू हुई यह परंपरा 92 साल बाद भी गांव में उसी उत्साह से गूंज रही है।

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