जालौन , जुलाई 19 -- उत्तर प्रदेश के जनपद जालौन में रविवार 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा जब भी होती है तो झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और नाना साहब जैसे महान क्रांतिकारियों के नाम प्रमुखता से सामने आते हैं। लेकिन बुंदेलखंड की धरती पर ऐसी कई वीरांगनाएं भी थीं, जिनके अद्वितीय योगदान के बावजूद उन्हें इतिहास में वह स्थान नहीं मिल सका जिसकी वे वास्तविक हकदार थीं। ऐसी ही एक महान महिला क्रांतिकारी थीं जालौन की ताईबाई, जिन्हें जनपद की पहली महिला क्रांतिकारी माना जाता है।
झाँसी के वरिष्ठ इतिहासकार देवेंद्र कुमार (डी.के. सिंह) ने बताया कि ताईबाई ने न केवल 1857 की क्रांति का नेतृत्व किया, बल्कि तात्या टोपे की सेनाओं को आर्थिक और सैन्य सहायता देकर चरखारी के युद्ध में विजय दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि ताईबाई का योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का गौरवपूर्ण अध्याय है, जिसे नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाना चाहिए।
इतिहासकार डॉ. हरीमोहन पुरवार ने भी अपनी शोध में ताईबाई के योगदान को विस्तार से रेखांकित किया है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2007 में स्वतंत्रता संग्राम की 150वीं वर्षगांठ पर प्रकाशित पुस्तक "1857 : कुछ टेलीग्राम, कुछ दस्तावेज - जनपद जालौन" में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि अंग्रेज अधिकारियों के अनुसार जालौन जिले में क्रांति का नेतृत्व तीन प्रमुख व्यक्तियों के हाथों में था-जालौन की ताईबाई, भदेख के राजा परीक्षित तथा बिलाया के ठाकुर बरजोर सिंह। दुर्भाग्यवश समय के साथ इन क्रांतिकारियों का योगदान जनस्मृति से लगभग ओझल हो गया।
डॉ. डी.के. सिंह के अनुसार ताईबाई जालौन के पूर्व शासक नाना गोविंद राव की नातिन थीं। गोविंद राव की पुत्री बालाबाई का विवाह गोपालराव से हुआ था और इसी दंपति की पुत्री ताईबाई थीं। उनका विवाह सागर जिले के हाटा निवासी नारायण राव से हुआ, लेकिन दोनों जालौन के राजपरिवार के साथ किले में ही निवास करते थे।
वर्ष 1840 में जालौन के तत्कालीन राजा की संतानहीन मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने ताईबाई के वैध अधिकार को नकारते हुए जालौन राज्य को अपने अधीन कर लिया। इस अन्याय ने ताईबाई के मन में अंग्रेजी शासन के प्रति गहरा आक्रोश पैदा कर दिया और यही आगे चलकर उनके क्रांतिकारी जीवन की प्रेरणा बना।
इतिहासकारों के अनुसार जून 1857 के प्रथम सप्ताह में 53वीं नेटिव इन्फैंट्री ने उरई में विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। विद्रोह की शुरुआत होते ही तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर कैप्टन ब्राउन उरई छोड़कर आगरा भाग गया। इस दौरान गुरसराय के राजा केशवराव ने जालौन किले पर अधिकार कर लिया। प्रारंभ में ताईबाई ने उन्हें क्रांति समर्थक समझकर सहयोग किया, लेकिन बाद में जब यह स्पष्ट हुआ कि वह अंग्रेज अधिकारियों और उनके परिवारों की सहायता कर रहे हैं तथा क्रांतिकारियों के लिए एकत्रित धन गुरसराय भेज रहे हैं, तब ताईबाई ने उनसे दूरी बना ली।
डी.के. सिंह ने बताया कि 29 अक्टूबर 1857 को तात्या टोपे विद्रोही सैनिकों के साथ जालौन पहुंचे। ताईबाई ने उन्हें पूरे घटनाक्रम से अवगत कराया। इसके बाद तात्या टोपे ने केशवराव को जालौन से हटाकर ताईबाई के पांच वर्षीय पुत्र गोविंद राव को जालौन की गद्दी पर बैठाया तथा ताईबाई को उसका संरक्षक घोषित करते हुए क्रांतिकारी सरकार की स्थापना की।
क्रांतिकारी सरकार के गठन के बाद पूरे क्षेत्र में पेशवा शासन का भगवा ध्वज फहराया गया। ताईबाई ने भाऊ विश्वास राव को अपना दीवान नियुक्त किया, जबकि कई सरकारी कर्मचारियों ने भी उनकी अधीनता स्वीकार कर ली। नारायण राव को उरई का तहसीलदार बनाया गया। बहुत कम समय में ताईबाई ने एक सशक्त सैन्य संगठन तैयार कर लिया और लगभग पांच लाख रुपये की व्यवस्था कर तात्या टोपे को उपलब्ध कराए, जिससे क्रांतिकारी अभियान को गति मिली।
तात्या टोपे के नेतृत्व में जालौन की सेना पहले कानपुर अभियान में शामिल हुई। यद्यपि वहां क्रांतिकारियों को पराजय का सामना करना पड़ा, लेकिन ताईबाई ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने दोबारा सैनिकों की भर्ती कर सेना को पुनर्गठित किया और चरखारी पर आक्रमण के लिए भेजा। डॉ. डी.के. सिंह ने बताया कि चरखारी के युद्ध में क्रांतिकारियों की विजय हुई, जिसकी खुशी में जालौन किले से 29 तोपों की सलामी दी गई। इस पूरे अभियान में धन, रसद और सैन्य व्यवस्था का दायित्व ताईबाई ने ही संभाला।
इतिहासकारों के अनुसार उस समय जालौन, कालपी, उरई, आटा, कोंच, कनार, मोहम्मदाबाद, सैदनगर और कोटरा सहित पूरे क्षेत्र से अंग्रेजी शासन का प्रभाव लगभग समाप्त हो गया था और क्रांतिकारी प्रशासन स्थापित हो गया था।
हालांकि वर्ष 1858 में कोंच के युद्ध में क्रांतिकारियों की हार और तात्या टोपे के ग्वालियर चले जाने के बाद परिस्थितियां बदल गईं। अंग्रेज सेनापति सर ह्यू रोज की सेना ने क्षेत्र में पुनः नियंत्रण स्थापित करना शुरू किया। हरदोई गुर्जर सहित अनेक गांवों में अंग्रेजों ने भीषण दमन चक्र चलाया और बड़ी संख्या में क्रांतिकारियों को फांसी पर चढ़ा दिया। इन घटनाओं से व्यथित होकर ताईबाई ने अंततः 10 मई 1858 को अपने पति नारायण राव, पुत्र गोविंद राव, दीवान विश्वास राव तथा अन्य साथियों के साथ तत्कालीन अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।
अंग्रेज सरकार ने ताईबाई की समस्त संपत्ति जब्त कर उनके विरुद्ध राजद्रोह का मुकदमा चलाया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इसके बाद उन्हें बिहार के मुंगेर में निर्वासित कर दिया गया, जहां जून 1870 में निर्वासन के दौरान उनका निधन हो गया।
वरिष्ठ इतिहासकार देवेंद्र कुमार (डी.के. सिंह) का कहना है कि ताईबाई केवल जालौन ही नहीं बल्कि पूरे बुंदेलखंड की गौरवशाली विरासत हैं। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार रानी लक्ष्मीबाई का नाम देशभर में सम्मान के साथ लिया जाता है, उसी प्रकार ताईबाई के संघर्ष, नेतृत्व और बलिदान को भी इतिहास में उचित स्थान मिलना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके अद्वितीय योगदान से प्रेरणा ले सकें।
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