जालौन , फरवरी 11 -- उत्तर प्रदेश के जनपद जालौन में सनातन धर्म के त्रिदेवों में भगवान शिव का स्थान सर्वोपरि माना जाता है। देशभर में शिव से जुड़े प्राचीन मंदिरों और तीर्थस्थलों की अनगिनत गाथाएं प्रचलित हैं।

वरिष्ठ इतिहासकार डॉक्टर हरिमोहन पुरवार ने बताया कि बुंदेलखंड की पावन धरती पर भी आस्था का ऐसा ही एक अद्भुत केंद्र स्थित है-जनपद जालौन की माधवगढ़ तहसील के अंतर्गत ग्राम सरावन में स्थित भूरेश्वर महादेव मंदिर। लगभग 1400 वर्ष पुराने इस मंदिर की विशेषता यहां स्थापित श्वेतवर्ण शिवलिंग है, जिसके बारे में स्थानीय मान्यता है कि वह हर वर्ष चावल के एक दाने के बराबर बढ़ता है।

ग्राम सरावन में स्थित यह प्राचीन मंदिर स्थानीय लोगों की गहरी आस्था और विश्वास का केंद्र है। शिवलिंग के श्वेतवर्ण स्वरूप के कारण यह मंदिर 'भूरेश्वर महादेव' के नाम से विख्यात है। ग्रामीणों के अनुसार, वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है कि शिवलिंग की ऊंचाई में हर साल सूक्ष्म वृद्धि होती है। बताया जाता है कि वर्तमान में शिवलिंग की ऊंचाई लगभग 97 सेंटीमीटर तक पहुंच चुकी है। इस चमत्कारिक मान्यता के कारण यहां श्रद्धालुओं की आस्था और भी प्रगाढ़ हो जाती है।

मंदिर के इतिहास से जुड़ी कथा भी अत्यंत रोचक है। स्थानीय जनश्रुति के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण रियासत काल में राजा श्रवण देव द्वारा कराया गया था। कहा जाता है कि एक बार राजा श्रवण देव हस्तिनापुर गए थे। वहां उन्हें स्वप्न में भगवान शिव के दर्शन हुए और उन्होंने शिवलिंग स्थापित करने का आदेश दिया। स्वप्नादेश के बाद राजा हस्तिनापुर से एक छोटे आकार का शिवलिंग लेकर लौटे। गांव के निकट एक स्थान पर उन्होंने उस शिवलिंग को रखा और किसी उपयुक्त स्थल पर स्थापित करने का विचार किया।

किंतु जब शिवलिंग को उस स्थान से उठाकर अन्यत्र ले जाने का प्रयास किया गया, तो राजा सहित कई लोग मिलकर भी उसे तिलभर भी हिला नहीं सके। इसे भगवान शिव की इच्छा मानकर राजा ने उसी स्थान पर शिवलिंग की स्थापना कर मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ कराया। तभी से यह शिवलिंग उसी स्थान पर स्थापित है और भूरेश्वर महादेव के रूप में पूजित हो रहा है।

गांव के नामकरण की कथा भी इसी इतिहास से जुड़ी है। बताया जाता है कि राजा श्रवण देव के नाम पर ही पुराने अभिलेखों में गांव का नाम 'श्रवण' दर्ज था। समय के साथ स्थानीय बोली में उच्चारण परिवर्तित होकर 'श्रवण' से 'सरावन' हो गया और यही नाम प्रचलित हो गया।

मंदिर की वास्तुकला भी अपने आप में विशिष्ट है। मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व दिशा की ओर है, जबकि निकास दक्षिण और प्रवेश उत्तर दिशा से होता है। मंदिर की छत छह मजबूत खंभों पर टिकी हुई है। मूल मंदिर की ऊंचाई लगभग 20 फुट बताई जाती है। इसके आगे बाद में एक विशाल बरामदे का निर्माण कराया गया, जिसकी लंबाई लगभग 40 फुट और चौड़ाई 30 फुट है। इस बरामदे के भीतर भी छह खंभे बने हुए हैं, जो इसकी प्राचीनता और स्थापत्य शैली को दर्शाते हैं।

मंदिर परिसर में एक विस्तृत मैदान है, जहां श्रद्धालु एकत्रित होते हैं। पेयजल के लिए नल की व्यवस्था भी की गई है।

परिसर में स्थित लगभग 800 वर्ष पुराना पीपल का वृक्ष विशेष आकर्षण का केंद्र है। कालांतर में इस पीपल के बीच से एक नीम का वृक्ष भी उग आया, जिसके कारण लोग इसे 'हरिशंकरी' के नाम से पुकारते हैं। स्थानीय मान्यता है कि इस वृक्ष की परिक्रमा करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

यहां के पुजारियों और ग्रामीणों के अनुसार, शिवलिंग का स्वरूप दिन में तीन अलग-अलग समय पर भिन्न-भिन्न दिखाई देता है-प्रातः, दोपहर और सायंकाल। इस अद्भुत परिवर्तन को भी श्रद्धालु भगवान शिव की दिव्य लीला मानते हैं।

यद्यपि मंदिर में वर्षभर श्रद्धालुओं का आगमन होता रहता है, लेकिन सावन मास और महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां विशेष भीड़ उमड़ती है। आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज से भी हजारों श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। सावन के सोमवारों पर तो यहां मेले जैसा दृश्य रहता है। भक्तजन जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और विशेष पूजन कर महाकाल की कृपा प्राप्त करने की कामना करते हैं।

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