नयी दिल्ली , सितंबर 22 -- राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 में 2026 के संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान मंगलवार को उच्चतम न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता एवं उड़ीसा उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस. मुरलीधर और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के बीच "नक्सलाइट" शब्द के इस्तेमाल को लेकर तीखी नोकझोंक हुई।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष यह सुनवाई हुई। कर्नाटक संगीत के सुप्रसिद्ध गायक टी.एम. कृष्णा की इस याचिका में 2026 के उस संशोधन को चुनौती दी गई है, जिसके तहत 'वंदे मातरम्' के गायन को जानबूझकर रोकने या इसके आयोजन में बाधा डालने पर तीन साल तक के कारावास का प्रावधान किया गया है।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुरलीधर ने कानून पर सवाल उठाते हुए तर्क दिया कि यह संशोधन "राष्ट्रीय गीत" के गायन को रोकने पर सजा का प्रावधान करता है, जबकि कानून में राष्ट्रीय गीत को परिभाषित ही नहीं किया गया है। इस पर पीठ ने टिप्पणी की, "यदि कोई इतिहास पढ़ने का कष्ट करे, तो हर कोई जानता है कि राष्ट्रीय गीत क्या है।" इस पर श्री मुरलीधर ने कहा कि "इतिहास संवैधानिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को बाध्य नहीं करता" और ऐसे मुद्दों को जनमत के माध्यम से विकसित होना चाहिए।
संसद की विधायी प्रक्रिया का बचाव करते हुए श्री मेहता ने कहा कि फैसले संसद द्वारा संविधान के अनुसार लिए जाते हैं, न कि उस तरीके से जैसे "नक्सलाइट" फैसला लेते हैं। श्री मुरलीधर ने इस शब्द के प्रयोग पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि ऐसा भाषण किसी विधि अधिकारी को शोभा नहीं देता। इस पर पीठ ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि वह इस शब्द को रिकॉर्ड पर नहीं लेगी और केवल संवैधानिक मुद्दे तक ही सीमित रहेगी।
श्री कृष्णा की इस याचिका में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम की संशोधित धारा तीन के साथ-साथ केंद्र सरकार के उन निर्देशों को भी चुनौती दी गई है, जिनके तहत विशिष्ट सरकारी, औपचारिक और सांस्कृतिक अवसरों पर वंदे मातरम् के सभी छह छंदों का गायन अनिवार्य किया गया है। याचिका में तर्क दिया गया है कि यह संशोधन नागरिकों को आपराधिक सजा के दायरे में लाता है और उन्हें उन अंतिम चार छंदों को गाने के लिए मजबूर करता है जिनमें धार्मिक संदर्भ शामिल हैं।
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