नयी दिल्ली , नवंबर 02 -- उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा ने सोमवार को एक जनहित याचिका (पीआईएल) की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। यह याचिका गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) 'लोक प्रहरी' द्वारा दायर की गई है, जिसमें उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया तय करने वाले 'मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर' (एमओपी) को अंतिम रूप देने की मांग की गई है।
यह मामला जब न्यायमूर्ति नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ के सामने आया, तो न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने कहा कि वह पहले भी एमओपी से जुड़े एक ऐसे ही मामले में 'अतिरिक्त महाधिवक्ता ' के तौर पर पेश हो चुके हैं, इसलिए वह इस याचिका की सुनवाई नहीं करेंगे।
इस जनहित याचिका में नियुक्ति प्रक्रिया को अंतिम रूप देने के अलावा उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम के फैसलों को 'सूचना का अधिकार अधिनियम' (आरटीआई एक्ट) के दायरे में लाने के लिए निर्देश देने की भी मांग की गई है।
याचिका में कहा गया है कि संवैधानिक अदालतों में नियुक्तियां कॉलेजियम की सर्वसम्मत राय पर आधारित होनी चाहिए। इसके लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा 16 दिसंबर, 2015 के अपने आदेश में तय किए गए मानदंडों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
सोलह दिसंबर, 2015 को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने आदेश दिया कि केंद्र सरकार, उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के साथ परामर्श करके 'मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर' (एमओपी) को अंतिम रूप देगी। मुख्य न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय के चार सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों से बने कॉलेजियम की सर्वसम्मत राय के आधार पर काम करेंगे।
इस आदेश में एमओपी में शामिल किए जाने वाले कई बिंदुओं की पहचान की गई, जिनमें पात्रता मानदंड, नियुक्तियों में पारदर्शिता, एक सचिवालय का गठन, शिकायतों से निपटने के लिए एक तंत्र और अन्य उचित उपाय शामिल थे।
सोलह अक्टूबर, 2015 को एनजेएसी को असंवैधानिक घोषित करने और उसके बाद 16 दिसंबर, 2015 का आदेश पारित करने वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ में न्यायमूर्ति जगदीश सिंह खेहर, जे. चेलमेश्वर, मदन बी. लोकुर, कुरियन जोसेफ और आदर्श कुमार गोयल शामिल थे। ये सभी न्यायाधीश अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
कॉलेजियम प्रणाली के तहत अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को तय करने वाले एमओपी को मूल रूप से 1999 में तैयार किया गया था। सोलह अक्टूबर, 2015 को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा 'नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट्स कमीशन' (एनजेएसी) को रद्द किए जाने के बाद, इसमें संशोधन का सवाल फिर से सामने आया। इसके बाद, 16 दिसंबर, 2015 के अपने आदेश में, अदालत ने केंद्र सरकार पर यह जिम्मेदारी छोड़ी कि वह न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता सुधारने के सुझावों पर विचार करते हुए एक संशोधित प्रक्रिया तैयार करे।
संशोधित मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (एओपी) को अंतिम रूप देने का मामला 2017 में उच्चतम न्यायालय भी पहुंचा। उस साल 27 अक्टूबर को न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित की पीठ ने वकील आर.पी. लूथरा की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि एमओपी को अंतिम रूप देने में कोई अनिश्चितकालीन देरी नहीं होनी चाहिए।
पीठ ने टिप्पणी की कि 'व्यापक जनहित में एमओपी को अंतिम रूप देने में अब और देरी नहीं होनी चाहिए।' साथ ही पीठ ने महाधिवक्ता को नोटिस जारी किया और वरिष्ठ वकील के.वी. विश्वनाथन को न्यायमित्र (एमिकस क्यूरी) नियुक्त किया। के.वी. विश्वनाथन अब उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश हैं।
बाद में यह मामला तीन न्यायाधीशों की एक पीठ के सामने रखा गया, जिसमें तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए. के. सीकरी और न्यायमूर्ति अमिताभ रॉय शामिल थे। ये सभी अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
आठ नवंबर 2017 को तीन न्यायाधीशों की इस पीठ ने 27 अक्टूबर के अपने आदेश को वापस ले लिया और लूथरा की याचिका का निपटारा कर दिया। पीठ ने कहा कि एनजेएसी और एमओपी तैयार करने से जुड़े पहले के फैसलों को देखते हुए, याचिका में की गई बाकी मांगों पर आगे बढ़ने की कोई आवश्यकता नहीं है।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित