अगरतला , अगस्त 10 -- टिपरा मोथा के प्रमुख प्रद्योत किशोर देबबर्मन ने स्पष्ट किया है कि जब तक 'टिपरासा समझौते' को लागू नहीं किया जाता, तब तक वह सत्तारूढ दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ किसी भी राजनीतिक साझेदारी में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने त्रिपुरा के आदिवासी लोगों के संवैधानिक अधिकारों और हितों की रक्षा को सबसे महत्वपूर्ण बताया।
श्री देबबर्मन ने भाजपा के साथ संभावित राजनीतिक व्यवस्था को लेकर चल रही अटकलों पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि उनका दल 'टिपरासा समझौता' लागू करने की पक्की प्रतिबद्धता के बिना किसी भी गठबंधन पर विचार नहीं करेगा।
टिपरा मोथा प्रमुख ने रविवार को एक फेसबुक लाइव सत्र के दौरान उल्लेख किया कि दोनों दलों के बीच संभावित सहयोग को लेकर विभिन्न रिपोर्ट और अफवाहें सोशल मीडिया और अन्य मंचों पर फैल रही हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा के साथ किसी भी राजनीतिक गठबंधन की चर्चा में 'टिपरासा समझौते' का क्रियान्वयन ही उनका मुख्य केंद्र बिंदु है।
श्री देबबर्मन ने कहा, "मैंने कई मीडिया माध्यमों में टिपरा मोथा और भाजपा के बीच गठबंधन को लेकर चल रही अटकलों को देखा है। मैं अपनी बात स्पष्ट करना चाहता हूं- चर्चा केवल टिपरासा समझौते के क्रियान्वयन को लेकर हो सकती है। इसके बिना, मुझे सहयोग की कोई संभावना नजर नहीं आती।" उन्होंने इस धारणा को भी खारिज कर दिया कि मंत्री पद, सरकारी पद या ब्लॉक सलाहकार समितियों का नेतृत्व करने के अवसर किसी गठबंधन का आधार बन सकते हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि इस तरह के सौदों से केवल कुछ चुनिंदा लोगों को फायदा होगा, जबकि बड़े आदिवासी समुदाय की उम्मीदों की अनदेखी होगी।
टिपरा मोथा प्रमुख ने स्पष्ट किया, "यदि मैं इन शर्तों पर गठबंधन के लिए सहमत हो जाता हूं, तो केवल मुट्ठीभर लोगों यानी करीब 10 से 15 लोगों को फायदा होगा, जबकि लाखों लोगों के महत्वपूर्ण हितों को नजरअंदाज कर दिया जाएगा।" उन्होंने दोहराया कि उनका मुख्य लक्ष्य उनके द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने वाले समुदायों के लिए एक संवैधानिक समाधान हासिल करना है।
श्री देबबर्मन ने इस बात पर जोर दिया कि टिपरा मोथा द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से ज्यादा जनता के कल्याण को प्राथमिकता देनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि जब व्यक्तिगत हित व्यापक समुदाय की जरूरतों पर हावी होने लगते हैं, तो जनसेवक बनने का मूल उद्देश्य ही खतरे में पड़ जाता है।
उन्होंने ऐसी अटकलों पर विराम लगाते हुए कहा कि उनकी त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बनने की कोई इच्छा नहीं है और उन्होंने कहा, "मैं मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठना चाहता।" उन्होंने संकेत दिया कि एक बार टिपरासा समझौता लागू हो जाने के बाद वह सक्रिय राजनीति से पीछे हटने पर विचार करेंगे।
श्री देबबर्मन ने कहा कि वह युवा नेताओं को मार्गदर्शन देने के लिए सलाहकार की भूमिका निभा सकते हैं लेकिन राजनीतिक आंदोलन को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अंततः युवा नेताओं की ही होगी। उनके इस बयान के बाद त्रिपुरा में भाजपा और टिपरा मोथा के बीच भविष्य के राजनीतिक संबंधों को लेकर चर्चाएं फिर तेज हो गई हैं।
ऐतिहासिक रूप से, यह रिश्ता सहयोग और टकराव दोनों से जुड़ा रहा है, खासकर आदिवासी आबादी को प्रभावित करने वाले मामलों और टिपरा समझौते के क्रियान्वयन को लेकर। टिपरा मोथा 2024 में भाजपा नीत त्रिपुरा सरकार का हिस्सा बन गया था, जिसके विधायक अनिमेष देबबर्मन और वृषकेतु देबबर्मन को मंत्रिपरिषद में शामिल किया गया था।
सरकारी स्तर पर इस सहयोग के बावजूद, महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दों पर गंभीर मतभेद अभी भी बने हुए हैं। 2026 के त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद चुनावों में मोथा के शानदार प्रदर्शन के बाद इस स्थिति की प्रासंगिकता और बढ़ गई है, जिसमें पार्टी ने 28 में से 24 सीटें जीतकर परिषद सरकार बनाने के लिए निर्णायक जनादेश प्राप्त किया था।
हाल की राजनीतिक घटनाओं के मद्देनजर, श्री देबबर्मन के लिए भविष्य के संभावित पदों (जैसे राज्यपाल पद या राज्यसभा के लिए नामांकन) को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। हालांकि, न तो भाजपा और न ही श्री देबबर्मन ने आधिकारिक तौर पर ऐसी किसी पहल की पुष्टि की है।
श्री देबबर्मन के हालिया बयानों से संकेत मिलता है कि टिपरा मोथा की मुख्य चिंता उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक आकांक्षाएं नहीं, बल्कि त्रिपुरा के आदिवासी समुदाय के लिए ठोस राजनीतिक और संवैधानिक गारंटी प्राप्त करना है।
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