नैनीताल , मई 13 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ऋषिकेश में नर्सिंग अधिकारियों की पदोन्नति से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए 'ओन मेरिट' सिद्धांत के आधार पर प्रस्तावित समीक्षा विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की प्रक्रिया पर फिलहाल रोक लगा दी है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने 12 मई को यह आदेश पारित किया। आदेश की प्रति बुधवार मिल पायी।
याचिकाकर्ता एम्स ऋषिकेश में वरिष्ठ नर्सिंग अधिकारी एवं नर्सिंग अधिकारी के पदों पर कार्यरत हैं। उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) की प्रधान पीठ नई दिल्ली के सात अप्रैल के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी जिसमें कैट ने याचिकाकर्ताओं को अंतरिम राहत देने से इनकार करते हुए मामले की अगली सुनवाई 20 मई तय कर दी थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से केंद्र सरकार के 10 मार्च 2026 तथा 29 अगस्त 2025 के आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिनमें वर्ष 2022 एवं 2023 के लिए नर्सिंग अधिकारी से वरिष्ठ नर्सिंग अधिकारी पद पर पदोन्नति हेतु रिव्यू डीपीसी कराने के निर्देश दिए गए थे। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यदि 'ओन मेरिट' सिद्धांत के आधार पर रिव्यू डीपीसी कराई गई तो उनसे कनिष्ठ आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों को अनारक्षित पदों पर पदोन्नति मिल सकती है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अभिजय नेगी ने दलील दी कि 'ओन मेरिट' का मुद्दा वर्तमान में उच्चतम न्यायालय में लंबित है। यह मामला "जरनैल सिंह एवं अन्य बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता एवं अन्य" शीर्षक विशेष अनुमति याचिका में विचाराधीन है। शीर्ष अदालत ने तीन फरवरी 2015 को आदेश देते हुए कहा था कि विवादित निर्णय से संबंधित पदोन्नति मामलों में यथास्थिति बनाए रखी जाए।
इसके बाद अवमानना याचिकाओं की सुनवाई के दौरान भारत सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में यह आश्वासन दिया था कि मुख्य मामला और अवमानना याचिका के अंतिम निर्णय तक आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों को अनारक्षित पदों पर आगे कोई पदोन्नति नहीं दी जाएगी।
इसी आधार पर भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने 30 सितंबर 2016 को कार्यालय ज्ञापन जारी कर स्पष्ट निर्देश दिए थे कि 10 अगस्त 2010 के कार्यालय ज्ञापन तथा रेलवे बोर्ड के 14 सितंबर 2010 के परिपत्र के आधार पर आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों को अनारक्षित पदों पर आगे पदोन्नति न दी जाए।
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