श्रीनगर , अगस्त 25 -- कश्मीर के मुख्य मौलवी मीरवाइज़ उमर फारूक ने मंगलवार को कहा कि 25 अगस्त, 1989 के "ऑपरेशन जामिया मस्जिद" से जुड़ी घटनाओं को याद करते हुए कहा कि इसकी यादें और ज़ख्म 37 साल बाद भी बने हुए हैं।

मीरवाइज ने 'एक्स' पर एक पोस्ट में कहा कि श्रीनगर की ऐतिहासिक जामिया मस्जिद ने "हमलों, घेराबंदी, बंदी और इसके मिंबर (उपदेश देने की जगह) की आवाज़ को दबाने की बार-बार की गई कोशिशों" का सामना किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि ऑपरेशन के दौरान मस्जिद की पवित्रता का उल्लंघन किया गया, नमाज़ियों को हिरासत में लिया गया और मस्जिद की पवित्र जगह को अपवित्र किया गया। उन्होंने कहा, " सैंतीस साल बाद भी ज़ख्म ताज़ा हैं।" उन्होंने मस्जिद को कश्मीर का "आध्यात्मिक केंद्र", इसके इतिहास का गवाह और यहां के लोगों की आस्था, सम्मान और अधिकारों की आवाज़ बताया।

यह बयान उस 'ऑपरेशन' की बरसी पर आया है, जो कश्मीर में सशस्त्र विद्रोह के शुरुआती दौर में हुआ था।

श्रीनगर के पुराने शहर नौहट्टा में स्थित जामिया मस्जिद जिसे 15वीं सदी की शुरुआत में बनाया गया था , सदियों से घाटी के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों में से एक रही है। 1989 में कश्मीर में उग्रवाद के फैलने के साथ यह मस्जिद अलगाववादी राजनीतिक गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी बन गयी।

घटना के विवरण के अनुसार उस साल 25 अगस्त को गिरफ़्तारियां करने के मकसद से चलाए गए एक ऑपरेशन के दौरान अर्धसैनिक बल मस्जिद परिसर में दाखिल हुए थे। इस ऑपरेशन के कारण मस्जिद को अपवित्र करने के आरोप लगे और पूरी घाटी में विरोध-प्रदर्शन हुए। उस समय मीरवाइज़ उमर फारूक के पिता मीरवाइज़ मोहम्मद फारूक मस्जिद के मुख्य धर्मगुरु थे। इक्कीस मई, 1990 को उग्रवादियों ने मीरवाइज़ मोहम्मद फारूक की हत्या कर दी थी। इसके बाद उनके बेटे उमर फारूक उत्तराधिकारी बने और मीरवाइज़ तथा जामिया मस्जिद के मुख्य धर्मगुरु का पद संभाला। उस समय वह 17 साल के थे।

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