चेन्नई , अगस्त 4 -- केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के नेतृत्व में अन्य संस्थानों के साथ किये गये एक नये अध्ययन से पता चला है कि भारत के सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (यूआईपी) में हेक्सावेलेंट (सिक्स-इन-वन) टीके को शामिल करने से देश के बाल टीकाकरण कार्यक्रम की दक्षता में सुधार हो सकता है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के डॉ. पवन कुमार और डॉ. कपिल सिंह, द जॉर्ज इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ इंडिया की डॉ. सुस्मिता चटर्जी, द गेट्स फाउंडेशन के डॉ. अरिंदम राय और डॉ. अमृता कुमारी, गावी (द वैक्सीन एलायंस) के डॉ. होमेरो हर्नांडेज़ और जॉन स्नो के डॉ. अरूप देब रॉय के नेतृत्व में किये गये अध्ययन के अनुसार यह टीका शिशुओं को लगने वाले टीकों की संख्या को कम करेगा, अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के कार्यभार को आसान बनाएगा, कोल्ड-चेन की आवश्यकताओं को कम करेगा और देखभाल करने वालों का समय बचायेगा।
हेक्सावेलेंट टीका एक छह-इन-वन संयोजन टीका है जो बच्चों को एक ही टीके में डिप्थीरिया, टेटनस, काली खांसी, हेपेटाइटिस बी, हेमोफिलस इन्फ्लुएंजा टाइप बी (हिब) और पोलियो सहित छह गंभीर बीमारियों से बचाता है। कई टीकों को एक में मिलाकर, यह नियमित टीकाकरण यात्राओं के दौरान शिशुओं को लगने वाले टीकों की संख्या को कम करता है।
अध्ययन से संकेत मिलता है कि यदि इस टीके की उपलब्धता बढ़ायी जाती है और इसे किफायती बनाया जाता है, तो यह आर्थिक लाभ प्रदान कर सकता है, टीकों की संख्या में बचत कर सकता है, संचालन की दक्षता में सुधार कर सकता है और एक प्रभावी टीका साबित हो सकता है। देश के टीकाकरण कार्यक्रम के हिस्से के रूप में प्रतिवर्ष लगभग 2.6 करोड़ (26 मिलियन) भारतीय बच्चों का टीकाकरण किया जाता है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि हेक्सावेलेंट टीके की कीमत समग्र कार्यक्रम लागत का सबसे बड़ा निर्धारक बनी हुई है।
अध्ययन में भारत में टीकों की खरीद के ऐतिहासिक रुझानों पर खास ध्यान दिया गया है। इसके आधार पर यह अनुमान लगाया गया है कि टीके की कीमत में 50 प्रतिशत की कमी से प्राथमिक टीकाकरण समय-सारणी के तहत अतिरिक्त टीका अधिग्रहण की लागत की तुलना में परिचालन और प्रणाली-स्तर की बचत ज्यादा हो जायेगी।
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