मुंबई , मार्च 14 -- मुंबई की एक अदालत ने हिल प्रॉपर्टीज़ लिमिटेडके सात पदाधिकारियों के खिलाफ समन जारी किया है।
यह समन मेटाऑक्साइड प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर एक शिकायत के आधार पर जारी किया गया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि दशकों से चली आ रही एक साज़िश के तहत हिल प्रॉपर्टीज़ लिमिटेड के अल्पसंख्यक शेयरधारकों को करोड़ों रुपये के संपत्ति सौदे से संबंधित उनके कानूनी 'प्री-एम्पशन' (अग्रक्रय) अधिकारों से वंचित किया गया।
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की ओर जारी इस समन का जवाब 17 मार्च को देना है। शिकायत में ब्रीच कैंडी अस्पताल के चिकित्सा निदेशक एवं हिल प्रॉपर्टीज़ लिमिटेड के निदेश डॉ. रोहित बर्मन, उनके साथ सात अन्य निदेशकों और अक्ज़ो नोबेल इंडिया लिमिटेड (जो आईसीआई इंडिया लिमिटेड की उत्तराधिकारी कंपनी है) का नाम शामिल है। इन पर आपराधिक साज़िश, आपराधिक विश्वासघात और धोखाधड़ी सहित कई कथित अपराधों में शामिल होने का आरोप है। न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) पीएस धोडकेe के समक्ष केस संख्या एसडब्ल्यू/134/2025 के रूप में दर्ज इस शिकायत में 'भारतीय न्याय संहिता, 2023' के तहत विभिन्न उल्लंघनों का आरोप लगाया गया है, जिनमें आपराधिक साज़िश (धारा 61), आपराधिक विश्वासघात (धारा 316), और धोखाधड़ी (धारा 318 और 319) शामिल हैं।
शिकायत के अनुसार, यह कथित साज़िश 32 साल से ज़्यादा समय तक चली है, यानी 1993 से 2025 तक और इसमें ज़रूरी दस्तावेज़ों को छिपाना, धोखाधड़ी वाले समझौते करना और शेयरधारकों के अधिकारों में जान-बूझकर रुकावट डालना शामिल है। मेटाऑक्साइड प्राइवेट लिमिटेड, जिसके पास हिल प्रॉपर्टीज़ लिमिटेड में 4.55 प्रतिशत शेयर हैं, का आरोप है कि हिल पार्क, मालाबार हिल में फ्लैट संख्या 39 से जुड़े एक सम्पत्ति के सौदे में उसे उसका 'प्री-एम्पशन' (खरीदने का पहला अधिकार) गैर-कानूनी तरीके से नहीं दिया गया। शिकायत के मुताबिक, 29 सितंबर 1993 को, आईसीआई इंडिया लिमिटेड और अमेरिकन एक्सप्रेस बैंक के बीच एक गुपचुप बिक्री समझौता हुआ था। यह समझौता कंपनी (हिल प्रोपर्टीज ) द्वारा शेयरधारकों को प्री-एम्पशन नोटिस भेजने से लगभग 20 दिन पहले ही हो गया था, जिसका मतलब है कि यह सौदा पहले ही तय हो चुका था।
मुंबई में संवाददाता सम्मेलन में बोलते हुए एसडीए एंड पार्टनर्स के प्रबंध साझेदार एवं उच्चतम न्यायालय के के वकील शांतनु देर,शांतनु डेरगावेन ने कहा, "यह मामला कॉर्पोरेट गवर्नेंस और भरोसे से जुड़ी जवाबदेही के गंभीर सवाल खड़े करता है। इस मामले में कंपनी के निदेशकों पर भरोसे से जुड़ी ज़िम्मेदारियों को जान-बूझकर तोड़ने, ज़रूरी दस्तावेज़ों को छिपाने और शेयरधारकों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कॉर्पोरेट नियमों का गलत इस्तेमाल करने के आरोप हैं। शिकायत में तथ्यों का एक विस्तृत ब्योरा दिया गया है, जिसके समर्थन में दस्तावेज़ी सबूत, अदालती फैसले और ट्रिब्यूनलों के सामने ली गई शपथ के साथ दिए गए बयान मौजूद हैं। इन कानूनी कार्रवाइयों से आपराधिक न्याय प्रणाली को इन मुद्दों की गहराई से जांच करने का मौका मिलेगा।" शिकायत में कहा गया है कि आयकर कानून के तहत फॉर्म 37-1, 30 सितंबर 1993 को ही दाखिल कर दिया गया था, और 28.5 लाख रुपये की बयाना राशि का भुगतान भी पहले ही हो चुका था। इससे यह साबित होता है कि यह सौदा असल में शेयरधारकों को उनके कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल करने का मौका मिलने से पहले ही पूरा हो चुका था।
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