श्रीनगर , अक्टूबर 13 -- केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने मंगलवार को कहा कि हिमालय और उसके पर्यावरण का संरक्षण राष्ट्रीय जिम्मेदारी है और इसमें प्रत्येक नागरिक की भागीदारी जरूरी है।
डॉ. सिंह ने यहां शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के शालीमार कन्वेंशन सेंटर में आयोजित 13वें अखिल भारतीय सतत पर्वतीय विकास शिखर सम्मेलन के विशेष सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि हिमालय देश की पारिस्थितिक सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र झरनों, जल निकायों, नदियों के स्रोतों और ग्लेशियरों को संजोए रखने के साथ पर्यटन, कृषि और स्थानीय लोगों की आजीविका को भी सहारा देता है।
केंद्रीय मंत्री ने अनधिकृत निर्माण और अनियंत्रित मानवीय गतिविधियों के प्रति आगाह करते हुए कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में ऐसी गतिविधियां पर्यावरणीय जोखिम बढ़ा सकती हैं। इसलिए विकास योजनाओं में पर्यावरण संरक्षण के उपायों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि स्थानीय समुदायों और अन्य हितधारकों में जागरूकता बढ़ाने के साथ जिम्मेदार सार्वजनिक व्यवहार को प्रोत्साहित करना भी जरूरी है। हिमालय का संरक्षण केवल सरकार और वैज्ञानिक संस्थानों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसमें समाज के हर वर्ग को योगदान देना होगा।
डॉ. सिंह ने हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) की विभिन्न पहलों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन और हिमालयी पर्यावरण पर शोध को मजबूत करने के लिए कश्मीर विश्वविद्यालय, सिक्किम विश्वविद्यालय और तेजपुर विश्वविद्यालय में तीन केंद्रों की पहचान की गयी है। इसके अलावा, भारतीय हिमालयी क्षेत्र में राज्य स्तरीय पहलों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन संबंधी अनुसंधान और संस्थागत क्षमता बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक शोध के आधार पर पर्वतीय क्षेत्रों की चुनौतियों को समझना और उनके अनुरूप समाधान विकसित करना आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी वर्ष 2015 से लद्दाख और डोडा क्षेत्र में ग्लेशियरों की निगरानी तथा क्षेत्र आधारित शोध कर रहा है। इसके तहत स्वचालित मौसम केंद्रों और सिस्मोग्राफ का उपयोग किया जा रहा है। संस्थान भूस्खलन और पूर्व में आए भूकंपों से संबंधित अध्ययन भी कर रहा है। उन्होंने कश्मीर में ग्लेशियोलॉजी के क्षेत्र में प्रशिक्षण और विशेषज्ञता विकसित करने की पहल का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत का मौसम रडार नेटवर्क वर्ष 2014 के 16 रडार से बढ़कर अब 50 तक पहुंच गया है। 'मिशन मौसम' के तहत 50 और रडार स्थापित करने की योजना है, जिससे मौसम की निगरानी और प्राकृतिक आपदाओं के प्रति तैयारियों को मजबूत किया जा सकेगा।
डॉ. सिंह ने जम्मू-कश्मीर के 10 गांवों में वाडिया इंस्टीट्यूट द्वारा शुरू किए गए पायलट अध्ययन का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इस अध्ययन से प्राप्त निष्कर्ष स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप प्रभावी उपाय तैयार करने में मदद कर सकते हैं। उनके मुताबिक, जम्मू-कश्मीर की प्रस्तावित सतत पर्वतीय विकास नीति को भी स्थानीय अनुभवों और वैज्ञानिक निष्कर्षों के आधार पर परखा जाना चाहिए, ताकि विकास की योजनाएं पर्यावरणीय सुरक्षा और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप बनायी जा सकें।
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