शिमला , जनवरी 13 -- हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने स्वीकृत संख्या से पांच न्यायाधीश कम होने के बावजूद 2025 में लगभग 90 प्रतिशत मामलों का निपटारा किया गया है।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, एक जनवरी 2025 तक उच्च न्यायालय में 93,942 मामले लंबित थे। वर्ष के दौरान 81,092 नए मामले दर्ज किए गए जबकि 72,981 मामलों का निपटारा किया गया। इस प्रकार, वर्ष के अंत तक लंबित मामलों की संख्या बढ़कर 1,02,053 हो गई लेकिन निपटारे की दर उल्लेखनीय रूप से 89.99 प्रतिशत रही।

उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सहित स्वीकृत 17 न्यायाधीशों की संख्या के मुकाबले न्यायालय में 12 न्यायाधीश कार्यरत हैं। वर्ष के दौरान उच्च न्यायालय ने जेल में बंद दोषियों, विचाराधीन कैदियों, महिलाओं के विरुद्ध अपराधों, यौन उत्पीड़न, नाबालिगों और वरिष्ठ नागरिकों से संबंधित मामलों को प्राथमिकता दी। निचली अदालतों में लंबित मामलों को त्वरित सुनवाई कर निपटाया गया ताकि मुकदमों में विलंब न हो।

लंबे समय से लंबित मामलों को निपटाने के उद्देश्य से, उच्च न्यायालय ने 2026 में 12 शनिवारों को कार्य दिवस घोषित किया है, जिनमें केवल सबसे पुराने मामलों की ही सुनवाई होगी। निपटान के आंकड़ों के अलावा, 2025 में उच्च न्यायालय ने कई संवेदनशील प्रशासनिक एवं राजनीतिक मामलों में सुनवाई की। न्यायालय ने कार्यपालिका द्वारा राजनीतिक विचारों के आधार पर पारित मनमाने तबादलों के आरोपों की जांच की और कहा कि प्रशासनिक विवेकाधिकार निष्पक्षता और स्थापित मानदंडों के अनुरूप होना चाहिए।सरकारी कर्मचारियों द्वारा बड़ी संख्या में दायर की गई याचिकाओं ने राजनीतिक रूप से प्रेरित नियुक्तियों एवं तबादलों के मुद्दों को न्यायिक जांच के दायरे में ला दिया।

उच्च न्यायालय ने दैनिक वेतन कर्मियों एवं संविदा कर्मचारियों के शोषण से संबंधित मामलों पर भी विस्तार से विचार किया जिनमें से कई ने वर्षों की सेवा के बावजूद वैध सेवा लाभों से वंचित किए जाने का आरोप लगाया था। न्यायालय ने बार-बार राज्य के इस दायित्व पर बल दिया कि वह एक आदर्श नियोक्ता के रूप में कार्य करे और अपने कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करे।

वर्ष 2025 में सत्ता से जुड़े कई जटिल अपराधिक मामले न्यायालय के समक्ष आए। केंद्रीय और राज्य जांच एजेंसियों के बीच हितों के टकराव को दर्शाने वाले विवादों के साथ-साथ राजनीतिक मतभेद एवं दलीय ध्रुवीकरण से उत्पन्न मुकदमों ने भी न्यायालय का ध्यानाकर्षित किया।

एक महत्वपूर्ण संवैधानिक निर्णय में, उच्च न्यायालय ने मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्ति को रद्द कर दिया और माना कि ऐसी नियुक्तियां संवैधानिक दायरे से बाहर हैं। इस फैसले ने कार्यपालिका के अधिकार की सीमाएं निर्धारित कीं और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को सुदृढ़ किया।

भूमि एवं पर्यावरण संबंधी मुद्दे मुकदमेबाजी का एक प्रमुख क्षेत्र बने रहे। न्यायालय ने राज्य को अतिक्रमण वाले भूमि को नियमित करने या आवंटित करने का अधिकार देने वाले कानूनों को चुनौती देने वाले मुकदमों के साथ-साथ वन भूमि पर अतिक्रमण से संबंधित बड़ी संख्या में मामलों की सुनवाई की। पर्यावरण संरक्षण, शासन एवं सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा से संबंधित मुद्दों पर सैकड़ों जनहित याचिकाएं दायर की गईं।

राज्य में जिला न्यायपालिका का प्रदर्शन और भी बेहतर रहा जिसने 106.23 प्रतिशत निपटान दर प्राप्त की। 2025 की शुरुआत में लगभग 6.31 लाख मामले लंबित थे जिनमें से अधीनस्थ न्यायालयों में 8,02,478 नए मामले दायर किए गए और उनमें से 8,52,488 मामलों का निपटारा किया गया, जिससे लंबित मामलों की संख्या घटकर लगभग 5.81 लाख रह गई। न्यायिक अधिकारियों के लिए निपटान लक्ष्य निर्धारित किए गए और उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप उनकी निगरानी की गई।

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