चेन्नई , अप्रैल 25 -- अभिनेता विजय की तमिलगा वेट्री कज़गम (टीवीके) पार्टी को पहले महज प्रशंसकों की भीड़ मानकर तिरस्कारपूर्वक अराजनीतिक 'थारक्कुरी' (अशिक्षित) कहा जा रहा था, लेकिन अब यह हाशिये से निकलकर मजबूत दावेदार के रूप में उभरी है और द्रविड़ बहुल क्षेत्र में इसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण होने की उम्मीद है।
मौजूदा सरकार के पक्ष या विपक्ष में कोई स्पष्ट लहर न होने के कारण टीवीके पार्टी की मैदान में मौजूदगी से तमिलनाडु की राजनीति में द्रविड़ एकाधिकार का अंत होता दिख रहा है।
इस मामले में विश्लेषक एकमत हैं, हालांकि मतभेद इस बात पर है कि विजय फैक्टर से सत्ताधारी द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) और विपक्षी अन्नाद्रमुक दोनों को कितना नुकसान होगा। लेकिन आम राय यह है कि टीवीके ने अन्नाद्रमुक के वोट बैंक को काफी हद तक अपने पाले में कर लिया है।
मतदान के दिन (23 अप्रैल) जो बात साफ तौर पर दिखी, वह यह थी कि टीवीके के सीटी चिह्न पर वोट देने वाले लोग खुलकर सामने आये। यहां तक कि द्रमुक या अन्नाद्रमुक से पारंपरिक रूप से जुड़े परिवारों के युवा और महिलाएं, जिनमें अल्पसंख्यक भी शामिल है, श्री विजय को वोट देने में बिल्कुल भी संकोच नहीं कर रहे थे।
परिवर्तन की चाहत के रूप में देखा जाने वाला यह उत्साह व्यापक था और रिपोर्टों के अनुसार यह केवल शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि ग्रामीण इलाकों तक भी फैला हुआ था। टीवीके की संगठनात्मक शक्ति और स्थापित पार्टियों के नेटवर्क की कमी की आलोचना और उपहास को गलत साबित करते हुए, आश्चर्यजनक रूप से टीवीके समर्थकों ने पूरे राज्य में बूथ एजेंट और स्वयंसेवकों के रूप में काम किया। यह पूरी तरह से स्वैच्छिक था, जबकि द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बूथ एजेंटों को जलपान के अलावा कम से कम 1500 रुपये का भुगतान किया गया था।
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