नैनीताल , जुलाई 25 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के माध्यम से751 विभिन्न सरकारी पदों को भरने के लिए चल रही भर्ती प्रक्रिया में राज्य आंदोलनकारियों के आरक्षण से जुड़े मामले में फिलहाल उनके वंशजों को नियुक्ति पत्र जारी करने पर रोक लगा दी है। साथ ही अदालत ने (यूकेएसएसएससी) को छह सप्ताह में विस्तृत जवाब पेश करने को कहा है।

न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने हरिद्वार निवासी सक्षम चौहान की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए ये निर्देश जारी किए। याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार के एक जुलाई 2026 के शासनादेश को चुनौती देते हुए कहा कि यूकेएसएसएससी की ओर से चार नवम्बर 2024 को सरकारी विभागों में रिक्त चल रहे विभिन्न 751 पदों को भरने के लिए विज्ञापन जारी किया गया। आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि एक नवंबर 2024 रखी गई।

इस मामले में आगे कहा गया कि राज्य सरकार ने एक जुलाई 2026 को एक शासनादेश जारी कर ऐसे अभ्यर्थियों को दस्तावेज सत्यापन में शामिल होने की अनुमति दे दी जिन्होंने राज्य आंदोलनकारियों को मिलने वाले आरक्षण का लाभ लेने के लिए आवेदन पत्र के साथ उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी प्रमाणपत्र संलग्न नहीं किया था।

याचिकाकर्ता की ओर से उच्चतम न्यायालय के तेज प्रकाश पाठक एवं अन्य बनाम राजस्थान उच्च न्यायालय एवं अन्य मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद विज्ञापन में निर्धारित पात्रता शर्तों को बीच में बदला नहीं जा सकता।

याचिकाकर्ता की ओर से इस शासनादेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। इस मामले में उच्च न्यायालय ने 15 और 22 जुलाई, 2026 को दो दिन सुनवाई की। एकलपीठ ने 15 जुलाई 2026 के अपने अंतरिम आदेश में राज्य आंदोलनकारियों के वंशजों को नियुक्ति पत्र जारी करने पर रोक लगा दी।

साथ ही राज्य सरकार और आयोग को एक सप्ताह के भीतर यह स्पष्ट करने के निर्देश दिए कि एक जुलाई 2026 का शासनादेश किस कानून और नियम के तहत जारी किया गया है।

अदालत के आदेश के बावजूद प्रदेश सरकार की ओर से जवाबी हलफनामा दायर नहीं किया जा सका जबकि आयोग की ओर से 22 जुलाई को हुई सुनवाई में बिना किसी स्पष्ट नियम या विनियम का हवाला दिए अपने कदम को सही ठहराने का प्रयास किया गया। आयोग की ओर से तर्क दिया गया कि राज्य आंदोलनकारियों के आश्रितों पर उसी प्रकार विचार किया जा सकता है, जिस प्रकार अनुसूचित जाति वर्ग के अभ्यर्थियों के वंशजों पर विचार किया जाता है।

अदालत ने इस तर्क को नकारते हुए कहा कि अनुसूचित जाति वर्ग के वंशजों को भी संबंधित श्रेणी में दावा करने के लिए सक्षम प्राधिकारी से प्रमाणपत्र प्राप्त करना होता है। कोर्ट ने आयोग की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण को खारिज कर दिया और सभी पक्षकारों को छह सप्ताह में विस्तृत जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए।

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