नयी दिल्ली , अप्रैल 07 -- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमणियन ने खाद्य पदार्थों में मिलावट पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वस्थ और रोगमुक्त जीवन जीने का अधिकार है।
इस दौरान न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमणियन ने खाद्य पदार्थों में मिलावट से निपटने के लिए भारत के कानूनी ढांचे का व्यापक अवलोकन प्रस्तुत किया और मद्रास मिलावट निवारण अधिनियम 1918 से लेकर खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 तक इसके विकास का विवरण दिया।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दशकों से कई स्तरों पर मिलावट को रोकने के लिए निरंतर प्रयास किए गए हैं। उन्होंने कहा कि जीवन प्रत्याशा में वृद्धि से जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार होना चाहिए, जैसा कि संविधान द्वारा गारंटीकृत है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वस्थ और रोगमुक्त जीवन जीने का अधिकार है और हितधारकों से आग्रह किया कि वे केवल आंकड़ों पर निर्भर रहने के बजाय मिलावटी भोजन के गहन प्रभाव पर विचार करें।
उन्होंने कहा कि 'औषधि के रूप में भोजन' के विचार का जिक्र करते हुए कि समय के साथ यह सिद्धांत कमजोर पड़ गया है। उन्होंने इस बात पर भी चिंता व्यक्त की कि खाद्य मिलावट निवारण अधिनियम 1954 के तहत खाद्य मिलावट के कुछ मामले आज भी अदालतों में लाए जाते हैं, जो अक्सर 15 साल पुरानी रिपोर्टों पर आधारित होते हैं, जिससे सबूत अप्रचलित हो जाते हैं और अभियोजन पक्ष कमजोर पड़ जाता है।
खाद्य उत्पादन में वृद्धि और मोबाइल प्रयोगशालाओं सहित परीक्षण इंफ्रास्ट्रक्चर की उपलब्धता का जिक्र करते हुए उन्होंने इनकी प्रभावशीलता और रखरखाव पर चिंता जताई। उपभोक्ताओं की उदासीनता को एक प्रमुख मुद्दा बताते हुए उन्होंने प्रतिभागियों से सरकारी हस्तक्षेप के लिए ठोस और कार्रवाई योग्य सुझाव देने का आग्रह किया।
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