चेन्नई , दिसंबर 16 -- भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के शोधकर्ताओं ने हरित हाइड्रोजन के गुणवत्ता और पर्यावरणीय प्रभाव के अनुसार इसके मानक वर्गीकरण का सुझाव दिया है।

आईआईटी मद्रास और टेक्नोलॉजी एंड पॉलिसी (सीएसटीईपी) के सेंटर फॉर स्टडी ऑफ साइंस द्वारा संयुक्त रूप से हाइड्रोजन उत्पादन पर एक व्यापक अध्ययन में कहा गया है कि हाइड्रोजन उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली अलग-अलग प्रौद्योगिकियों के कारण हाइड्रोजन के अलग-अलग पदचिन्ह होते हैं, भले ही सभी हाइड्रोजन नवीकरणीय उर्जा से उत्पादित हों।

शोध में प्रस्ताव दिया गया है कि एक मानक वर्गीकरण प्रणाली अपनाते हुए हाइड्रोजन को 'प्लेटिनम', 'गोल्ड' 'सिल्वर', और 'ब्रोंज' श्रेणी में वर्गीकृत किया जाना चाहिए, ताकि हाइड्रोजन की पर्यावरणीय गुणवत्ता के बारे में लोगों को स्पष्ट रूप से अवगत कराया जा सके। इससे नीति निर्माताओं, निवेशकों और उद्योग हितधारकों के लिए पारदर्शी जानकारी उपलब्ध होगी।

मंगलवार को आईआईटी मद्रास द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि यह शोध अमेरिकन केमिकल सोसाइटी द्वारा प्रकाशित प्रतिष्ठित, 'पीयर-रिव्यू जर्नल' 'एनर्जी एंड फ्यूल्स' में प्रकाशित हुआ है। शोध के सह-लेखक पीटर वाइकी, रामप्रसाद थेक्केथिल, मुरली अनंतकुमार और प्रोफेसर सत्यनारायण शेषाद्री हैं।

आईआईटी मद्रास के रिसर्च स्कॉलर पीटर वाइकी ने कहा, "हमारा शोध 'प्रोटॉन-एक्सचेंज मेम्ब्रेन' (पीईएम) प्रणाली नामक एक प्रकार के इलेक्ट्रोलाइज़र पर केंद्रित है। पीईएम इलेक्ट्रोलाइज़र पारंपरिक क्षारीय प्रणालियों की तुलना में अधिक कुशल हैं और बड़ी मात्रा में हाइड्रोजन उत्पादन के लिए अच्छी तरह से अनुकूल हैं, जो उन्हें स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को बढ़ाने की भारत की योजनाओं के लिए आदर्श बनाते हैं।"यह अध्ययन पीईएम इलेक्ट्रोलाइज़र के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण कच्चे माल को सुरक्षित करने के लिए भी मार्गदर्शन प्रदान करता है, जिससे भारत का हरित हाइड्रोजन बुनियादी ढांचा मज़बूती से विकसित हो सके।

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