चंडीगढ़ , अगस्त 04 -- पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने केंद्र सरकार द्वारा ई-20 (20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित) पेट्रोल को अनिवार्य रूप से लागू किये जाने के फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि यह नीति देश के करोड़ों वाहन मालिकों और उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने वाली है।
उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने इस फैसले से पहले वैज्ञानिकों, वाहन निर्माताओं, विशेषज्ञों और आम लोगों से पर्याप्त सलाह-मशविरा नहीं किया।
पंजाब विधानसभा में मंगलवार को ई-20 पेट्रोल संबंधी प्रस्ताव का समर्थन करते हुए श्री चीमा ने कहा कि वर्ष 2030 तक चरणबद्ध तरीके से लागू की जाने वाली योजना को समय से पहले लागू कर दिया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने भारतीय उपभोक्ताओं और वाहन मालिकों के हितों की अनदेखी की है।
उन्होंने कहा कि पंजाब परिवहन विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार राज्य में एक करोड़ 25 लाख 88 हजार 851 पंजीकृत दोपहिया, चारपहिया और व्यावसायिक वाहन हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में पुराने वाहनों वाले राज्यों पर ई-20 ईंधन को अनिवार्य रूप से लागू करना व्यावहारिक नहीं है।
वित्त मंत्री ने स्थानीय मैकेनिकों से प्राप्त जानकारी का हवाला देते हुए दावा किया कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के कारण यदि वाहन में तकनीकी खराबी आती है, तो उसकी मरम्मत पर 25 हजार से 50 हजार रुपये तक का खर्च आ सकता है। उन्होंने कहा कि इससे डिलीवरी बॉय, छोटे व्यापारी और रोजाना वाहन चलाकर आजीविका कमाने वाले लोगों पर सबसे अधिक असर पड़ेगा।
श्री चीमा ने यह भी दावा किया कि केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने संसद में ई-20 के कारण ईंधन की माइलेज में छह प्रतिशत तक कमी आने की बात स्वीकार की थी। उनका कहना था कि वास्तविक प्रभाव इससे भी अधिक हो सकता है। उन्होंने कहा कि इथेनॉल उत्पादन के लिए भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है, जिससे पहले से गिरते भूजल स्तर वाले पंजाब जैसे राज्यों में जल संकट और गंभीर हो सकता है। इसलिए इस नीति के पर्यावरणीय प्रभावों का भी व्यापक अध्ययन आवश्यक है।
वित्त मंत्री ने कहा कि ई-20 के खिलाफ चलाये जा रहे अभियान को देशभर से व्यापक समर्थन मिला है। उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर आयोजित एक संवाद कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, पंजाब और राजस्थान सहित विभिन्न राज्यों के मैकेनिकों और विशेषज्ञों ने भाग लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त कीं। उनके अनुसार इससे स्पष्ट है कि यह केवल पंजाब का नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा है, जिस पर केंद्र सरकार को तत्काल पुनर्विचार करना चाहिए।
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