रांची , मार्च 30 -- झारखंड के पलामू टाइगर रिजर्व और बूढ़ापहाड़ के जंगलों से एक सकारात्मक बदलाव की तस्वीर सामने आई है।
कभी नक्सल प्रभावित और अशांत माने जाने वाले इन इलाकों में अब ग्रामीण स्वेच्छा से अपने देसी हथियार छोड़कर मुख्यधारा की ओर लौट रहे हैं। पिछले सात महीनों में प्रशासन ने गुप्त सूचनाओं और जंगलों में अभियान चलाकर करीब 40 हथियार बरामद किए हैं।
इस बदलाव की शुरुआत अक्टूबर 2025 में आयोजित वन्यजीव सप्ताह के दौरान हुई, जब पलामू टाइगर रिजर्व प्रशासन ने ग्रामीणों से अपील की थी कि वे वन्यजीवों की सुरक्षा और क्षेत्र में शांति बनाए रखने के लिए अवैध हथियार सरेंडर करें।
इस अपील का असर साफ दिखा-23 ग्रामीणों ने आगे आकर अपने हथियार जमा किए, जिसके बाद यह अभियान लगातार आगे बढ़ता रहा। जांच में सामने आया कि अधिकांश हथियार 12 बोर की देसी बंदूकें हैं, जिनका उपयोग ग्रामीण जंगली जानवरों के शिकार और आत्मरक्षा के लिए करते थे। हालांकि, कुछ मामलों में इन हथियारों के नक्सली गतिविधियों से जुड़े होने की आशंका भी जताई गई है। बीते एक साल में छापेमारी और स्वैच्छिक सरेंडर के जरिए 42 से अधिक हथियार जब्त किए जा चुके हैं, जिनका संबंध झारखंड-छत्तीसगढ़ सीमा से भी जुड़ा पाया गया है।
पलामू और आसपास के क्षेत्रों में पारंपरिक शिकार की पुरानी परंपरा रही है। 1970 के दशक से यह इलाका वन्यजीव शिकार के लिए जाना जाता था। नक्सलवाद के दौर में कई ग्रामीणों ने डर या प्रभाव में आकर हथियार छिपाकर रखे थे। लेकिन अब नक्सली गतिविधियों में कमी और प्रशासन के प्रति बढ़ते भरोसे के कारण लोग इस परंपरा से दूरी बनाकर शांति की राह पर आगे बढ़ रहे हैं।
पलामू टाइगर रिजर्व के उपनिदेशक प्रजेशकांत जेना के अनुसार, "क्षेत्र में जनभागीदारी बढ़ाने के लिए लगातार जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। यह उत्साहजनक है कि ग्रामीण अब खुद आगे आकर गोपनीय रूप से हथियारों की जानकारी दे रहे हैं। स्वेच्छा से हथियार छोड़ने वालों का स्वागत है, लेकिन अवैध हथियार छिपाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।"फिलहाल सभी बरामद हथियारों को टाइगर रिजर्व के गोदाम में सुरक्षित रखा गया है। प्रशासन को उम्मीद है कि इस पहल से न केवल क्षेत्र में अपराध और अवैध शिकार में कमी आएगी, बल्कि दुर्लभ वन्यजीवों के संरक्षण को भी नई मजबूती मिलेगी।
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