नयी दिल्ली , जनवरी 29 -- संसद में गुरुवार को पेश वित्त वर्ष 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि देश ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश के जरिए बेहतर एवं किफायती सुविधाएं प्रदान कर स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में आज पेश आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में स्वस्थ आबादी बेहतर भविष्य का प्रमुख आधार बताते हुए कहा गया है कि ये सार्वजनिक निवेश रक्षात्मक एवं निवारक देखभाल, पोषण और स्वास्थ्य बीमा प्रणाली को अधिक सुलभ बनाने के उद्देश्य से किए गए हैं। शिशु एवं मातृ मृत्यु दर में कमी लाई गई है, सार्वभौमिक टीकाकरण के कवरेज का विस्तार किया गया है और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा की सुलभता को बेहतर बनाया गया है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, आयुष्मान भारत एवं विविध बीमारियों के नियंत्रण संबंधी कार्यक्रम जैसी पहलों ने इस प्रगति को गति दी है। इसमें कहा गया है कि मानव पूंजी और आर्थिक उत्पादकता मजबूत करने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य की उन्नति के महत्व पर विशेष ध्यान आकर्षित किया गया है।
संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण में इस तथ्य को रेखांकित किया गया है कि 1990 के बाद से, देश ने मातृ मृत्यु दर में 86 प्रतिशत की कमी दर्ज की गयी है जो वैश्विक औसत 48 प्रतिशत से कहीं अधिक है। इसी प्रकार, पांच वर्ष से कम आयु की मृत्यु दर में 78 प्रतिशत की गिरावट हासिल हुई जो 1990-2023 के दौरान वैश्विक स्तर पर 54 प्रतिशत की तुलना में 61 प्रतिशत की वैश्विक कमी और नवजात मृत्यु दर में 70 प्रतिशत से अधिक की गिरावट है।
महत्वपूर्ण रूप बात यह है कि पिछले दशक में शिशु मृत्यु दर में 37 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गयी, जो 2013 में प्रति हजार जीवित जन्मों पर 40 से घटकर 2023 में 25 हो गई है। बेहतर स्वास्थ्य सेवा में डिजिटल तकनीकी को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा गया है कि नवाचारों से पारदर्शिता बढ़ाने, व्यवस्था के विखंडन को कम करने तथा स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच का विस्तार करने वाली एकीकृत स्वास्थ्य एवं बीमा प्रणालियों का निर्माण किया गया है।
आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि भारत में मोटापा चिंताजनक तेजी से बढ़ रहा है और यह प्रमुख स्वास्थ्य संबंधी चुनौती बन गया है। स्वास्थ्य के लिए हानिकारक आहार, भागदौड़ भरी जिंदगी सहित जीवन-शैली में बदलाव, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स का अत्यधिक सेवन सभी आयुवर्ग के लोगों को प्रभावित कर रहा है और मधुमेह (डायबिटीज), हृदयरोग और हाइपरटेंशन जैसे गैर-संक्रामक रोगों का इससे खतरा बढ़ रहा है। वर्ष 2019-21 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के अनुसार 24 प्रतिशत भारतीय महिलाओं और 23 प्रतिशत भारतीय पुरुष मोटापे के शिकार हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि अधिक वजन की समस्या के शिकार पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की संख्या 2015-16 में 2.1 प्रतिशत से बढ़कर 2019-21 में 3.4 प्रतिशत हो गई।
सर्वेक्षण में मोटापे को एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती रूप में पहचानते हुए कहा गया है कि सरकार ने इस समस्या के निदान के लिए कई पहल शुरू की हैं ताकि स्वास्थ्य, पोषण, शारीरिक गतिविधि, खाद्य सुरक्षा और जीवनशैली में सुधार को एकीकृत करते हुए समग्र दृष्टिकोण अपनाया जा सके। पोषण अभियान एवं पोषण 2.0, फिट इंडिया मूवमेंट, खेलो इंडिया, ईट राइट इंडिया, राष्ट्रव्यापी जागरूकता अभियान - आज से थोड़ा कम जैसे कदम इन पहलों के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इसके अलावा, एफएसएसएआई ने 'मोटापा रोकें, मोटापा भगाएं - मोटापा रोकने हेतु जागरूकता पहल' अभियान शुरू किया है।
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (यूपीएफ) जो लंबे समय से स्थापित आहार पैटर्न को विस्थापित कर रहे हैं इससे आहार की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है तथा ये अनेक दीर्घकालिक रोगों के बढ़े हुए जोखिम से जुड़े हुए हैं। आर्थिक समीक्षा में आहार संबंधी सुधारों को सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकता बताई गई है। युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य में आई गिरावट और डिजिटल व्यसन के बीच निकट संबंध है। विविध भारतीय एवं वैश्विक अध्ययनों ने 15-24 वर्ष के युवाओं में सोशल मीडिया के बढ़ते व्यसन की पुष्टि की है। सोशल मीडिया के व्यसन का जुड़ाव घबराहट, अवसाद, आत्मविश्वास में कमी और साइबरबुलिंग से उपजे दबाव के साथ भी है। भारतीय युवाओं को परेशान करने वाली अन्य समस्याओं में कंपल्सिव स्क्रॉलिंग, सामाजिक तुलना और गेमिंग से जुड़ी विकृतियां शामिल हैं। ये समस्याएं किशोरों में नींद कमी, आक्रामकता, सामाजिकता में कमी और अवसाद को जन्म देती हैं।
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