नयी दिल्ली , अक्टूबर 29 -- भारतीय नौसेना के दो दिन के नवाचार और स्वदेशीकरण सेमिनार स्वावलंबन-2026 में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने, स्वदेशी तकनीकों को विकसित करने और उन्हें सेना के इस्तेमाल के लायक बनाने पर जोर दिया गया।
सेमिनार में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), क्वांटम प्रौद्योगिकी, हाइपरसोनिक प्रौद्योगिकी और मानवरहित प्रणालियों के भविष्य में इस्तेमाल पर भी चर्चा हुई।
रक्षा मंत्रालय ने गुरुवार को बताया कि 'नवाचार और स्वदेशीकरण से शक्ति' विषय पर आयोजित इस पांचवें सेमिनार में रक्षा बलों, उद्योग जगत, स्टार्टअप, छोटे और मझोले उद्यमों, शिक्षण संस्थानों और निवेशकों ने हिस्सा लिया।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सेमिनार के पहले दिन प्रदर्शनी का जायजा लिया और रक्षा क्षेत्र में काम कर रहे उद्योगों के प्रतिनिधियों से बातचीत की। उन्होंने रक्षा नवाचार और स्वदेशीकरण में योगदान देने वाले विशेषज्ञों और आईडेक्स से जुड़े नवाचारकर्ताओं को सम्मानित भी किया।
सेमिनार में स्वावलंबन 5.0 दस्तावेज और तकनीकी जरूरतों, समस्याओं तथा भविष्य की योजनाओं से जुड़ा संकलन जारी किया गया। प्रदर्शनी में भारतीय नौसेना की जरूरतों के अनुरूप विकसित स्वदेशी प्रौद्योगिकियों और समाधानों को प्रदर्शित किया गया। इनमें समुद्री निगरानी, ड्रोन से निपटने वाली प्रौद्योगिकी, एआई, क्वांटम प्रौद्योगिकी और सुरक्षा से जुड़े उपकरण शामिल थे।
दूसरे दिन की चर्चाओं में मानवरहित प्रणालियों और एआई के जरिए अलग-अलग क्षेत्रों में सैन्य अभियानों के बेहतर तालमेल, निगरानी और फैसले लेने की क्षमता बढ़ाने पर विचार किया गया। क्वांटम तकनीक के संचार और निगरानी में इस्तेमाल तथा हाइपरसोनिक तकनीक की रक्षा क्षेत्र में भूमिका पर भी चर्चा हुई।
सेमिनार में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए आईडेक्स व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया गया। इसमें स्टार्टअप के नवाचारों को बड़े रक्षा प्लेटफॉर्म से जोड़ने, परीक्षण और प्रमाणन की प्रक्रिया को सरल बनाने तथा स्वदेशी आपूर्ति व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत बताई गई। शिक्षण संस्थानों में हुए शोध को उपयोगी उत्पादों में बदलने और स्टार्टअप, उद्योगों तथा शोधकर्ताओं के बीच सहयोग बढ़ाने पर भी चर्चा हुई।
निवेशकों और वेंचर कैपिटल से जुड़े प्रतिनिधियों के साथ बातचीत में स्वदेशी रक्षा तकनीकों के विकास, उत्पादन और व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए वित्तीय सहायता की संभावनाओं पर विचार किया गया। सेमिनार में इस बात पर जोर दिया गया कि स्वदेशी तकनीकों को केवल शुरुआती नमूने बनाने तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उनका परीक्षण, प्रमाणन, बड़े स्तर पर उत्पादन और रक्षा बलों में इस्तेमाल भी सुनिश्चित किया जाए।
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