धनबाद , सितंबर 22 -- झारखंड के आईआईटी (आईएसएम) धनबाद में मंगलवार को शताब्दी व्याख्यान का आयोजन किया गया।

इस अवसर पर पद्मश्री से सम्मानित और विवेकानंद रॉक मेमोरियल एवं विवेकानंद केंद्र, कन्याकुमारी की अखिल भारतीय अध्यक्ष सु. निवेदिता रघुनाथ भिड़े ने "उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्त होने तक मत रुको : युवाओं के लिए एक संदेश" विषय पर छात्रों और संस्थान के सदस्यों को संबोधित किया।

कार्यक्रम का आयोजन इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग विभाग की ओर से संस्थान के शताब्दी वर्ष के तहत किया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर एवं कार्यक्रम समन्वयक प्रो. रवि कुमार गंगवार द्वारा सु. निवेदिता भिड़े के परिचय से हुई। उन्होंने उनके सामाजिक कार्यों, शिक्षा के क्षेत्र में योगदान और विवेकानंद केंद्र के साथ लंबे जुड़ाव के बारे में बताया।

आईआईटी (आईएसएम) के निदेशक प्रो. सुकुमार मिश्रा ने अपने संबोधन में कहा कि स्वामी विवेकानंद के विचार केवल उनके समय तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आज भी मानव समाज के लिए प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा का मकसद केवल नौकरी या आजीविका हासिल करना नहीं होना चाहिए।

उन्होंने कहा, "एजुकेशन शुड बी द ओवरऑल डेवलपमेंट ऑफ ए ह्यूमन बीइंग टू ह्यूमनकाइंड। इफ वी कैन डू दैट, देन आवर एजुकेशन इज डिफाइंड एंड सक्सेसफुल।" उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद के विचारों को शब्दशः याद करने के बजाय उनके मूल संदेश को समझकर जीवन में उतारना ज्यादा जरूरी है।

सु. निवेदिता भिड़े ने कहा कि स्वामी विवेकानंद का प्रसिद्ध संदेश "उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्त होने तक मत रुको" केवल किसी व्यक्ति को प्रेरित करने वाला संदेश नहीं था, बल्कि यह भारत के पुनरुत्थान का भी आह्वान था। उन्होंने बताया कि स्वामी विवेकानंद ने भारत और पश्चिमी देशों की यात्रा के दौरान दोनों समाजों को करीब से देखा और भारत की विशिष्ट ताकत को समझा।

उन्होंने कहा कि भारत की सबसे बड़ी विशेषताओं में विविधता को स्वीकार करना और सभी को अपनेपन की भावना से देखना शामिल है। उनके अनुसार, भारत की सोच केवल सहन करने की नहीं, बल्कि विविधता को स्वीकार करने की रही है।

"अराइज" का मतलब समझाते हुए उन्होंने कहा कि युवाओं को आलस्य, जड़ता, ईर्ष्या और पहल करने की कमी से बाहर निकलना होगा। वहीं "अवेक" का अर्थ केवल जागना नहीं, बल्कि अपने जीवन और देश के उद्देश्य को समझना है। उन्होंने कहा कि भारत के विकास का मतलब केवल अच्छी अर्थव्यवस्था, मजबूत सेना या विज्ञान एवं तकनीक में प्रगति नहीं है, बल्कि देश की मूल भावना को अपने जीवन में उतारना भी है।

सु. निवेदिता ने धर्म को केवल पूजा-पाठ या रिलिजन से जोड़ने के बजाय कर्तव्य, जिम्मेदारी, त्याग और दूसरों के प्रति सम्मान से जोड़कर समझाया। उन्होंने कहा कि समाज में हर व्यक्ति का अपना दायित्व है और अपने कर्तव्य को ईमानदारी से निभाना ही धर्म का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

उन्होंने युवाओं से कहा कि आज मोबाइल और डिजिटल तकनीक उनके हाथ में बड़ी ताकत है। इसका सही इस्तेमाल ज्ञान हासिल करने और समाज की समस्याओं के समाधान में किया जा सकता है, लेकिन अनुशासन की कमी होने पर यही तकनीक उनका समय भी बर्बाद कर सकती है।

उन्होंने कहा कि छात्रों को अपने जीवन में अनुशासन, एकाग्रता, आत्मविश्वास और आंतरिक शक्ति विकसित करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रोफेशनल लक्ष्य समय के साथ बदल सकते हैं, लेकिन जीवन का बड़ा उद्देश्य देश और समाज के लिए योगदान देना होना चाहिए।

आईआईटी (आईएसएम) के छात्रों से बातचीत करते हुए उन्होंने विज्ञान और तकनीक को समाज की जरूरतों से जोड़ने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत को विज्ञान एवं तकनीक में अपनी पुरानी क्षमता को फिर से मजबूत करते हुए ऐसी तकनीक विकसित करनी चाहिए, जो मानव जीवन और पर्यावरण के लिए उपयोगी हो।

कार्यक्रम के दौरान सु. निवेदिता भिड़े को निदेशक प्रो. सुकुमार मिश्रा ने सम्मानित भी किया। कार्यक्रम में संस्थान के शिक्षक, अधिकारी, कर्मचारी और बड़ी संख्या में छात्र उपस्थित रहे।

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