नयी दिल्ली , जुलाई 22 -- माहे श्रेणी के स्वदेशी पनडुब्बी रोधी युद्धपोत आईएनएस मालवन को बुधवार को कारवाड़ नौसैनिक अड्डे पर नौसेना के बेड़े में शामिल कर लिया गया।

यह इस श्रेणी का दूसरा युद्धपोत है। वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए. पी. सिंह ने समारोह की अध्यक्षता की। इस अवसर पर पश्चिमी नौसेना कमान के प्रमुख वाइस एडमिरल संजय वत्सायन और नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी, कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड कोच्चि के प्रतिनिधि, पूर्व सैनिक और कुछ विशेष मेहमान भी मौजूद थे।

रक्षा मंत्रालय ने बताया कि इस युद्धपोत का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है क्योंकि इसका नाम महाराष्ट्र के ऐतिहासिक तटीय शहर 'मालवन' पर रखा गया है। यह क्षेत्र छत्रपति शिवाजी महाराज की शानदार समुद्री विरासत से जुड़ा हुआ है। यह जहाज़ अपने पहले वाले जहाज़ (जो भारतीय नौसेना का इनशोर माइनस्वीपर था और 2003 तक सेवा में रहा) की विरासत को भी आगे बढ़ाता है।

आईएनएस इस श्रेणी के आठ जहाजों में से दूसरा है कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा देश में ही बनाया गया है। यह नौसेना में शामिल होने वाले 16 पनडुब्बी रोधी युद्धपोतों में से छठा है। कुल 80 प्रतिशत से ज़्यादा स्वदेशी सामग्री के साथ यह युद्धपोत सरकार के 'आत्मनिर्भर भारत' के विज़न को मज़बूत करता है। साथ ही, यह नौसेना के डिज़ाइन, उपकरण, सिस्टम इंटीग्रेशन और रक्षा क्षेत्र में जहाज़ बनाने की क्षमता में देश के बढ़ते इकोसिस्टम और आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा देता है।

यह युद्धपोत पानी के नीचे निगरानी , पनडुब्बी रोधी ऑपरेशन और कम तीव्रता वाले समुद्री ऑपरेशन के साथ-साथ बारूदी सुरंग युद्ध प्रणाली की क्षमता से भी लैस है। यह जहाज़ तटीय रक्षा और समुद्री सुरक्षा को और मज़बूत करेगा तथा समुद्री क्षेत्र के बारे में जागरूकता बढ़ाएगा।

आईएनएस मालवन के प्रतीक चिह्न में 'शेर के पंजे' को दिखाया गया है, जो बहादुरी, युद्ध की रणनीति, फुर्ती और साहस का प्रतीक है। यह जहाज़ के तेज़ी से हमला करने और चुपके से वार करने के स्वभाव को दर्शाता है। 'शेर के पंजे' के चारों ओर बनी लहरें तटों के आस-पास के विशाल समुद्र और देश के समुद्रों व संप्रभुता की रक्षा के लिए हमेशा सतर्क, तैयार और अडिग रहने के भारतीय नौसेना के पक्के संकल्प को दिखाती हैं। जहाज़ का आदर्श वाक्य 'साइलेंट क्लॉज़' , घातक क्षमता, चुपके से काम करने की खूबी और दुश्मन पर तेज़ी से हमला करने की काबिलियत को दर्शाता है।

वायु सेना प्रमुख ने इस अवसर पर वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच बिना रुकावट समुद्री व्यापार सुनिश्चित करने के लिए समुद्री संचार लाइनों की सुरक्षा के महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने भारतीय नौसेना की शानदार प्रगति और 'आत्मनिर्भर' पहल के प्रति उसकी प्रतिबद्धता की तारीफ़ की, और खास तौर पर युद्धपोत में 80 प्रतिशत से ज़्यादा स्वदेशी सामग्री के इस्तेमाल का ज़िक्र किया। नौसेना द्वारा जहाज़ निर्माण की प्रक्रिया में सीधे अधिकारियों को शामिल करने के मॉडल से प्रेरणा लेते हुए, उन्होंने सुझाव दिया कि इसी तरह के तरीकों से पूरे रक्षा इकोसिस्टम में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिल सकता है। उन्होंने तीनों सेनाओं के एकीकरण के विज़न को भी दोहराया और सेना, नौसेना तथा वायु सेना के बीच बेहतर तालमेल का आह्वान किया, ताकि भविष्य की लड़ाइयों में देश एक एकजुट ताकत के तौर पर सफल हो सके।

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