मुंबई , मई 07 -- बॉम्बे उच्च न्यायालय ने 2005 के कथित फर्जी मुठभेड़ मामले में गैंगस्टर सोहराबुद्दीन शेख, उसकी पत्नी कौसर बी और सहयोगी तुलसीराम प्रजापति की हत्या के आरोप में बरी किये गये 22 पुलिसकर्मियों के खिलाफ दायर अपील गुरुवार को खारिज कर दी।

मुख्य न्यायाधीश आलोक आराधे और न्यायमूर्ति गौतम अंखद की खंडपीठ ने पीड़ित परिवारों की ओर से दायर उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें गुजरात के 22 पुलिस अधिकारियों को बरी करने वाले विशेष अदालत के फैसले को चुनौती दी गयी थी।

परिजनों ने निचली अदालत के फैसले को रद्द करने अथवा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 386 (ए) के तहत मामले की दोबारा सुनवाई कराने की मांग की थी। अपील 2019 से उच्च न्यायालय में लंबित थी और इस वर्ष आदेश सुरक्षित रखा गया था।

अपीलकर्ताओं ने दलील दी थी कि मुकदमे की सुनवाई गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण रही और साक्ष्यों का गलत मूल्यांकन किया गया।

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि आरोपियों को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। न्यायालय ने कहा कि मामला कई पुलिस अधिकारियों और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों की कथित संलिप्तता से जुड़ा था, लेकिन अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में विफल रहा।

सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी कौसर बी की 2005 में हुई कथित फर्जी मुठभेड़ ने देशभर में व्यापक चर्चा बटोरी थी। इससे जुड़े तुलसीराम प्रजापति मुठभेड़ मामले ने भी काफी सुर्खियां बटोरी थीं।

मध्यप्रदेश के निवासी सोहराबुद्दीन पर रंगदारी, अपहरण और हथियार तस्करी समेत कई गंभीर मामले दर्ज थे। वर्ष 2004 में उसने राजस्थान के मार्बल कारोबारी पाटनी बंधुओं से कथित रूप से रंगदारी मांगी थी। मामला मूल रूप से गुजरात में दर्ज हुआ था, लेकिन 2012 में सीबीआई के अनुरोध पर उच्चतम न्यायालय ने इसे मुंबई स्थानांतरित कर दिया था।

मुकदमे की सुनवाई के दौरान न्यायाधीश बी एच लोया की 2014 में मृत्यु हो गई थी। बाद में न्यायाधीश एम बी गोसावी ने तत्कालीन भाजपा नेता अमित शाह को मामले से बरी कर दिया था। इसके बाद शेष आरोपियों के खिलाफ सुनवाई चली।

विशेष सीबीआई अदालत ने 21 दिसंबर 2018 को गुजरात, राजस्थान और आंध्र प्रदेश के 22 सेवारत एवं सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों को बरी कर दिया था। न्यायालय ने कहा था कि अभियोजन पक्ष साजिश और हत्या के आरोप साबित नहीं कर सका।

मुकदमे के दौरान 210 गवाहों के बयान दर्ज किए गए थे, जिनमें से 92 गवाह पक्षद्रोही हो गए थे। 358 पृष्ठों के फैसले में विशेष अदालत ने मृतकों के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की थी, लेकिन कहा था कि केवल संदेह या नैतिक आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।

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