इटावा , अप्रैल 03 -- उत्तर प्रदेश में इटावा स्थित सैफई चिकित्सा विश्विद्यालय की मुकबधिर मानसिक रोगी महिला के गर्भपात की अनुमति के लिए पुलिस उच्च न्यायालय जाएगी।
इटावा में गर्भपात की अनुमति लिए स्थानीय अदालत में पुलिस ने प्रत्यावेदन किया था लेकिन पुलिस को उच्च न्यायालय जाने की सलाह दी गई है।
शासकीय अधिवक्ता शिवकुमार शुक्ला ने शुक्रवार को यहां बताया कि सैफई पुलिस और मेडिकल बोर्ड ने संयुक्त रूप से दुष्कर्म की शिकार मानसिक रोगी मूकबधिर महिला के पांच माह के गर्भ होने को लेकर गर्भपात के सिलसिले में सत्र (वरिष्ठ प्रभाग) न्यायालय में प्रत्यावेदन दिया था जिस पर अदालत ने आपत्ति प्रकट करते हुए उच्च न्यायालय जाने की सलाह दी है। अब सैफई पुलिस उच्च न्यायालय में गर्भपात को लेकर के अपना प्रत्यावेदन करेगी।
श्री शुक्ला ने बताया कि कभी-कभी गंभीर मामलों में निचली अदालत सुनवाई के दौरान उन्हें उच्च अदालतों के लिए स्थानांतरित कर देती है। ऐसा ही कुछ सैफई चिकित्सा विश्वविद्यालय के गर्भपात मामले में भी सामने आया है।
सैफई चिकित्सा विश्वविद्यालय में दुष्कर्म पीड़िता के गर्भपात की अनुमति पर निचली अदालत ने असमर्थता जताई है जिसके बाद बहुचर्चित दुष्कर्म प्रकरण में नया कानूनी मोड़ आ गया है। पीड़िता के गर्भपात की अनुमति को लेकर सैफई पुलिस के प्रस्तुत प्रार्थना पत्र पर सत्र (वरिष्ठ प्रभाग) न्यायालय ने सुनवाई करने में असमर्थता व्यक्त करते हुए प्रकरण को उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए जाने की बात कही है।
अब मामले की विवेचना कर रहे प्रभारी निरीक्षक भूपेंद्र राठी और विश्वविद्यालय प्रशासन संयुक्त रूप से आगे की प्रक्रिया पूरी करते हुए उच्च न्यायालय इलाहाबाद में अनुमति के लिए प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करेंगे।
पुलिस की ओर से न्यायालय में दाखिल प्रार्थना पत्र में पीड़िता की चिकित्सकीय स्थिति, उसकी मानसिक अवस्था और विश्वविद्यालय द्वारा गठित मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को आधार बनाया गया था। मेडिकल परीक्षण में पीड़िता करीब 16 सप्ताह से अधिक गर्भवती पाई गई है। विशेषज्ञों की रिपोर्ट के अनुसार नियमानुसार 20 सप्ताह तक गर्भपात संभव है, लेकिन इस प्रकार के मामलों में न्यायालय की अनुमति आवश्यक होती है।
इस पूरे प्रकरण में विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा गठित तीन समितियों की रिपोर्ट महत्वपूर्ण आधार बनी है।
विश्वविद्यालय के डीन प्रो.(डॉ.) आदेश कुमार की अध्यक्षता में गठित नौ सदस्यीय जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में विभागाध्यक्ष प्रोफेसर ए.के.मिश्रा सहित वार्ड में तैनात 14 कर्मचारी और सफाई कार्य से जुड़ी कंपनी की लापरवाही को चिह्नित किया था। इसके बाद कार्यपरिषद की बैठक में रिपोर्ट प्रस्तुत कर विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है।
वहीं, पीड़िता के स्वास्थ्य परीक्षण के लिए मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रोफेसर (डॉ.) एसपी सिंह की निगरानी में गठित नौ सदस्यीय मेडिकल बोर्ड, जिसकी अध्यक्षता गायनी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ.) कल्पना सिंह ने की, ने अपनी रिपोर्ट में पीड़िता को करीब 16 सप्ताह पांच दिन की गर्भवती बताया है।
साथ ही यह भी उल्लेख किया गया है कि पीड़िता की मानसिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह स्वयं बच्चे की देखभाल कर सके, ऐसे में न्यायालय की अनुमति के उपरांत गर्भपात कराया जाना उपयुक्त हो सकता है।
गौरतलब है कि मानसिक रोग विभाग में 14 जून 2025 को करीब 38 वर्षीय अज्ञात महिला को भर्ती कराया गया था। वहीं, 17 मार्च 2026 को रुटीन जांच के दौरान उसके गर्भवती होने की पुष्टि हुई, जिसके बाद इस पूरे मामले का खुलासा हुआ।
इसके बाद मानसिक रोग विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ अरुण कुमार मिश्रा द्वारा थाना सैफई में मुकदमा दर्ज कराया गया, जिसमें सफाई कर्मी रविंद्र कुमार वाल्मीकि निवासी लखना, थाना बकेवर, जनपद इटावा को आरोपित बनाया गया।
पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया। इसके बाद पीड़िता और आरोपित के डीएनए नमूने जांच के लिए भेजे गए तथा विशेषज्ञों की मदद से न्यायालय में पीड़िता के बयान दर्ज कराए गए।
इस संबंध में विश्विद्यालय के कुलसचिव दीपक वर्मा ने बताया कि पीड़िता के स्वास्थ्य परीक्षण सहित सभी आवश्यक चिकित्सकीय प्रक्रियाएं पूर्ण कर ली गई हैं और संबंधित रिपोर्ट विवेचना अधिकारी को उपलब्ध करा दी गई है। यूनिवर्सिटी प्रशासन हर स्तर पर जांच और विधिक प्रक्रिया में सहयोग कर रहा है।
प्रभारी निरीक्षक भूपेंद्र राठी ने बताया कि निचली अदालत की ओर से प्रकरण को उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए जाने की आवश्यकता जताई गई है। अब विधिक प्रक्रिया के तहत उच्च न्यायालय में प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर आगे की अनुमति प्राप्त की जाएगी।
श्री शुक्ला ने बताया कि मूक बधिर मानसिक रोगी महिला को न्याय दिलाने के लिए अदालत पूरी तरह से कृत संकल्पित है। ऐसे में न्यायिक आदेश की बहुत अधिक जरूरी है।
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