जयपुर , अप्रैल 25 -- उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा है कि कहा कि एक न्यायाधीश हमेशा न्यायाधीश होता है और सेवानिवृत्त न्यायाधीश एक लाइब्रेरी की तरह है, जिससे आज की युवा पीढ़ी को हर दिन कुछ ना कुछ नया सीखना चाहिए।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने शनिवार को यहां एसोसिएशन ऑफ रिटायर्ड जजेज एवं राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा 'द बैंच बियोन्ड रिटायरमेंट: वैकल्पिक विवाद समाधान के संवर्धन और आम जनता में कानून के प्रति जागरूकता में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की भूमिका' विषय पर आयोजित सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि बुजुर्ग हमारे समाज में एक बावड़ी की तरह कार्य करते हैं, जो समय आने पर अपने अनुभव से किसी भी समस्या का सही समाधान बता सकते हैं। इसी कड़ी में सेवानिवृत्त न्यायाधीश लोक अदालत में मध्यस्थता के जरिए सकारात्मक बदलाव लाने में अपना योगदान दे रहे हैं।
उन्होंने सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के अनुभव का बेहतर उपयोग के लिए एक संगठित राष्ट्रीय ढांचा बनाया जाना चाहिए ताकि उनकी सेवाओं को संस्थागत रुप दिया जा सके और न्याय प्रणाली को मजबूत बनाया जा सके। उन्होंने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा द्वारा कोर्ट में वाद से पहले लोक अदालत का रुख करने की अपील की प्रशंसा करते हुए कहा कि मध्यस्थता किसी भी विवाद का त्वरित समाधान दिला सकती है।
इस अवसर पर श्री शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि समाज न्यायाधीशों द्वारा कहे गए शब्दों का अनुसरण करता है और इसी से सकारात्मक परिवर्तन आता है। देश के इतिहास में उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों ने न्यायाधीशों द्वारा ऐसे अनेक ऐतिहासिक फैसले दिए गए हैं, जिन्होंने करोड़ों लोगों के जीवन को बेहतर बनाया है। उन्होंने आमजन से कोर्ट में वाद से पहले एक बार मध्यस्थता केंद्र या लोक अदालत जाने की अपील की। साथ ही युवाओं से आह्वान किया कि अनुभवी लोगों से प्राप्त अनुभव को समाज एवं राष्ट्र हित में उपयोग करें।
मुख्यमंत्री ने कहा कि न्यायपालिका लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ होने के साथ ही कानून और संविधान की रक्षक है जो हर नागरिक को समान अधिकार देती है। चाहे मौलिक अधिकारों की रक्षा हो, पर्यावरण का संरक्षण हो, महिलाओं के अधिकार हो या भ्रष्टाचार पर प्रहार न्यायपालिका हमेशा आगे रही है। न्यायाधीश केवल मुकदमे ही नहीं सुनते हैं, बल्कि हर उस व्यक्ति की उम्मीद होते हैं, जिसे न्याय की जरूरत होती है।
उन्होंने कहा कि अनुभवी न्यायाधीशों की भूमिका आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। उनका अनुभव, विद्वता और न्याय-दृष्टि देश की अमूल्य धरोहर है। जिनसे विधिक जागरूकता बढ़ाने और वैकल्पिक विवाद समाधान से मुकदमों का बोझ कम करने में सहायता मिलती है। मध्यस्थता, सुलह, लोक अदालत और बातचीत से विवादों को न सिर्फ कम समय में सुलझाया जा सकता है, बल्कि अदालतों पर काम का बोझ भी कम किया जा सकता है। जब विवाद प्रेम से सुलझते हैं, तो मुकदमेबाजी की प्रवृत्ति कम होती है और सामाजिक समरसता बढ़ती है।
श्री शर्मा ने कहा कि देश के हर व्यक्ति को त्वरित और पारदर्शी तरीके से न्याय मिले, यही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विजन है। इसके लिए क्रांतिकारी परिवर्तन करते हुए डिजिटल इंडिया और ई-गवर्नेंस के माध्यम से न्याय प्रणाली को तेज, पारदर्शी एवं अधिक प्रभावी बनाया जा रहा है। वहीं, नए कानूनों में दण्ड के स्थान पर न्याय को प्राथमिकता देते हुए पुरानी भारतीय दण्ड संहिता के स्थान पर भारतीय न्याय संहिता लाई गई है।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार द्वारा नए कानूनों के सफल क्रियान्वयन के लिए पुलिस और अभियोजन को प्रशिक्षण दिया जा रहा है वहीं अदालतों की संख्या में बढ़ोतरी के साथ न्यायालय भवनों का आधुनिकीकरण किया जा रहा है, ताकि हर नागरिक को समय पर न्याय मिल सके।
राजस्थान उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजीव प्रकाश शर्मा ने कहा कि आमजन को जागरूक करने एवं सुलभ न्याय पहुंचाने में रालसा महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है वहीं लोक अदालतों में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के अनुभव से मध्यस्थता के जरिए पुराने विवादों का निस्तारण किया जा रहा है।
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