सुलतानपुर , अक्टूबर 20 -- कोलकाता के बाद दुर्गापूजा की भव्यता, दिव्यता और विस्तार देखना हो तो सुलतानपुर आइए। यहां मां भगवती की नौ दिन तक आराधना के बाद दशहरे से पंडालों की सजावट और दुर्गा जागरण का सिलसिला शुरू होता है। अगले कई दिनों तक आकर्षक पंडालों, भव्य झांकियों और धार्मिक आयोजनों से पूरा शहर उत्सवमय हो उठता है। इस अनूठे महोत्सव को देखने के लिए उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों के साथ देश के दूसरे हिस्सों से भी लोग पहुंचते हैं। यहां की सबसे खास परंपरा प्रतिमाओं का विसर्जन है, जो दशहरे के बजाय शरद पूर्णिमा पर सामूहिक शोभायात्रा के रूप में शुरू होता है और करीब 36 घंटे में संपन्न होता है।

लखनऊ-वाराणसी राजमार्ग पर लखनऊ से करीब 140 किलोमीटर, अयोध्या से 65 किलोमीटर, प्रयागराज से 100 किलोमीटर और काशी से 155 किलोमीटर दूर स्थित सुलतानपुर गोमती नदी के तट पर बसा है। इस नगर को भगवान श्रीराम के पुत्र कुश से जुड़ी प्राचीन नगरी कुशभवनपुर के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक आयोजनों के साथ सांप्रदायिक सौहार्द की परंपरा भी इसकी विशिष्ट पहचान है।

सुलतानपुर में दुर्गापूजा महोत्सव की शुरुआत करीब 67 वर्ष पहले 1959 में शहर के ठठेरी बाजार से हुई थी। यहां भिखारीलाल सोनी ने सहयोगियों के साथ पहली प्रतिमा स्थापित कराई थी। बिहार से बुलाए गए तेतर पंडित और जनक नामक मूर्तिकारों ने इस प्रतिमा का निर्माण किया था। उस समय विसर्जन के लिए प्रतिमा को डोली में ले जाया जाता था, जिसे उठाने में आठ कहार लगते थे।

पहली विसर्जन शोभायात्रा सीताकुंड घाट के पास पहुंची तो जिला प्रशासन ने विसर्जन पर रोक लगा दी थी। बाद में सामाजिक लोगों के हस्तक्षेप से प्रतिमा का विसर्जन हो सका। शुरुआती दो वर्षों तक इसी तरह की स्थिति बनी रही। वर्ष 1961 में रुहट्टा गली में बंगाली प्रसाद सोनी ने काली माता की प्रतिमा स्थापित कराई। इसके बाद 1970 में लखनऊ नाका पर कालीचरण उर्फ नेता ने संतोषी माता की प्रतिमा स्थापित कराई। वर्ष 1973 में अष्टभुजी माता, श्री अंबे माता, श्री गायत्री माता और श्री अन्नपूर्णा माता की प्रतिमाओं की स्थापना के साथ महोत्सव का विस्तार तेजी से हुआ। धीरे-धीरे शहर से लेकर तहसीलों, ब्लाकों और गांवों तक दुर्गापूजा की परंपरा फैल गई।

केंद्रीय दुर्गापूजा समिति के महामंत्री सुनील श्रीवास्तव के अनुसार, वर्तमान में शहर और आसपास के क्षेत्रों में करीब 250 से 300 प्रतिमाएं तथा पूरे जिले में 900 से अधिक प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। हर साल प्रतिमाओं की संख्या में दो से चार की वृद्धि हो रही है।

शुरुआत में प्रतिमाओं को कहार डोली पर उठाकर ले जाते थे, लेकिन अब बिजली की आकर्षक सजावट से सजे ट्रैक्टरों पर प्रतिमाएं और झांकियां क्रमबद्ध तरीके से निकाली जाती हैं। वर्ष 1983 के बाद से शहर में मंदिरों की आकृतियों पर आधारित भव्य पंडाल बनाने की परंपरा ने महोत्सव को नई पहचान दी। इन पंडालों के निर्माण और सजावट पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं। दूरदराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए विशाल भंडारे के साथ दवा और अन्य आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था भी स्थानीय स्वयंसेवी संस्थाएं करती हैं।

महोत्सव के दौरान रामलीला मैदान में नौ दिनों तक रामलीला की झांकियां प्रस्तुत की जाती हैं। दशहरे पर रावण दहन के बाद छह दिनों तक दुर्गापूजा मेले का आयोजन होता है। इसमें भरत-मिलाप सहित विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। शहर की गलियों और मोहल्लों में सजावट, पंडालों और झांकियों की रौनक देखते ही बनती है।

सप्ताह भर चलने वाले आयोजनों के बाद प्रतिमाओं की सामूहिक विसर्जन शोभायात्रा निकलती है। करीब 36 घंटे तक चलने वाली यह यात्रा सीताकुंड घाट पर संपन्न होती है। इसे देखने के लिए आसपास के जिलों से हजारों लोग पहुंचते हैं। इस दौरान शहर की सड़कों और बाजारों में भारी भीड़ रहती है।

जिला सुरक्षा संगठन के मुख्य संरक्षक सरदार बलदेव सिंह के अनुसार, भिखारीलाल सोनी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा रखी गई दुर्गापूजा महोत्सव की नींव लगातार मजबूत होती गई है। सुलतानपुर की गंगा-जमुनी तहजीब इस आयोजन की प्रमुख विशेषता है। कई दुर्गापूजा समितियों में मुस्लिम समुदाय के लोग भी सदस्य हैं। विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से वे श्रद्धालुओं की सेवा और आयोजन की व्यवस्थाओं में सहयोग करते हैं। सभी समुदायों के लोग मिलकर इस महापर्व को सफल बनाते हैं।

इस वर्ष पार्वती माता पूजा समिति पंच कैलाश की आकर्षक झांकी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी है। अष्टभुजी माता की ओर से मंगल उत्सव के तहत आठ दिवसीय विशेष आयोजन किया जा रहा है। गोलाघाट में टॉफी और मोतियों से बनी सजावट तथा अंबे माता, बाल दुर्गा और संतोषी माता की गुफाओं के स्वरूप वाले पंडाल भी दर्शकों को आकर्षित कर रहे हैं।

करीब छह दशक से अधिक समय से चली आ रही यह परंपरा अब केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि सुलतानपुर की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकता का प्रतीक बन चुकी है। शहर में करीब एक पखवाड़े तक दिन-रात उत्सव का माहौल रहता है। विभिन्न धर्मों के लोगों की भागीदारी और प्रशासन के सहयोग से यह महोत्सव सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश करता है।

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