नयी दिल्ली , अप्रैल 14 -- जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों और अधिकार कार्यकर्ताओं ने मंगलवार को कहा कि सुरक्षित गर्भपात को नैतिक बहस के बजाय स्वास्थ्य और अधिकार के मुद्दे के रूप में देखा जाना चाहिए।
प्रतिज्ञा अभियान और फाउंडेशन फॉर रिप्रोडक्टिव हेल्थ सर्विसेज (एफआरएचएस) इंडिया के तत्वाधान में यहां आयोजित संवाद सत्र में जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं ने यह बात कही।
कार्यक्रम में एफआरएचएस इंडिया के सीईओ आशुतोष कौशिक, नेहा श्रीवास्तव, डॉ. संगीता बत्रा और प्रतिज्ञा अभियान की सदस्य देबांजना चौधरी सहित कई विशेषज्ञों और मीडिया प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस दौरान गर्भपात से जुड़े सामाजिक, कानूनी और स्वास्थ्य संबंधी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई।
विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में गर्भपात का कानूनी ढांचा अपेक्षाकृत प्रगतिशील है, लेकिन जमीनी स्तर पर महिलाओं की पहुंच अभी भी सीमित है। जटिल प्रक्रियाएं, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, सामाजिक कलंक और सही जानकारी का अभाव बड़ी बाधाएं हैं।
चर्चा में यह भी सामने आया कि दवा-आधारित गर्भपात का उपयोग बढ़ रहा है, लेकिन सही मार्गदर्शन के अभाव में इसके असुरक्षित इस्तेमाल की आशंका भी बढ़ रही है। विशेषज्ञों ने कहा कि गर्भपात की विधियां सुरक्षित हैं, समस्या गलत जानकारी और सेवाओं की कमी से पैदा होती है। उनका कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों, युवाओं और वंचित वर्गों के सामने यह समस्या और जटिल हो जाती है, जहां गोपनीयता की कमी, सामाजिक दबाव और प्रशिक्षित स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच जैसी चुनौतियां मौजूद हैं।
विशेषज्ञों ने मीडिया की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि गर्भपात जैसे संवेदनशील मुद्दे को सनसनीखेज बनाने के बजाय जिम्मेदारी और तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए। गलत जानकारी को रोकने और लोगों में जागरूकता बढ़ाने में मीडिया की भूमिका अहम है।
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