शिलांग , फरवरी 02 -- कोऑर्डिनेशन कमेटी फॉर इंटरनेशनल बॉर्डर (सीसीआईबी) ने मेघालय के खासी और जयंतिया हिल्स क्षेत्रों में भारत-बांग्लादेश अंतरराष्ट्रीय सीमा पर प्रस्तावित बाड़बंदी का विरोध करते हुए राज्य और केंद्र सरकार से इस निर्णय की समीक्षा करने की मांग की है। समिति का कहना है कि बाड़बंदी के कारण स्थानीय भूमि मालिकों को अपनी जमीन गंवानी पड़ेगी, जिसे वे स्वीकार नहीं करेंगे।

सीसीआईबी के महासचिव केमेन मिरचियांग ने कहा कि यदि सीमा की ज़ीरो लाइन से 150 गज की दूरी पर बाड़ लगाई जाती है, तो इससे भूमि मालिक अपनी जमीन से वंचित हो जाएंगे। उन्होंने सवाल उठाया कि जब त्रिपुरा में ज़ीरो लाइन से केवल 5 से 10 मीटर की दूरी पर बाड़बंदी संभव है, तो मेघालय में वही मानक क्यों लागू नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि सीमा क्षेत्रों में रहने वाले लोग वर्ष 2011 में हस्ताक्षरित भारत-बांग्लादेश भूमि सीमा प्रोटोकॉल से अनजान थे। श्री मिरचियांग ने पूछा, "हम भूमि मालिकों को इस समझौते पर हस्ताक्षर से पहले न तो जानकारी दी गई और न ही हमसे कोई परामर्श किया गया। यह हमारे लिए एक बड़ा आश्चर्य था।"उल्लेखनीय है कि वर्ष 2015 में इस प्रोटोकॉल के क्रियान्वयन के साथ दोनों देशों के बीच सीमा विवाद का निपटारा किया गया था, जिसमें एन्क्लेव और प्रतिकूल कब्जे वाले क्षेत्रों की अदला-बदली की गई। इसी के तहत यह भी सहमति बनी थी कि बाड़बंदी ज़ीरो लाइन से 150 गज (लगभग 137 मीटर) की दूरी पर की जाएगी, क्योंकि बांग्लादेश इस बाड़ को रक्षा संरचना मानता है, जो द्विपक्षीय समझौते के तहत सीमा के बेहद नज़दीक स्वीकार्य नहीं है।

श्री मिरचियांग ने यह आरोप लगाया कि यह समझौता स्थानीय लोगों को विश्वास में लिए बिना किया गया। उन्होंने कहा कि बाड़ लगने के बाद सीमा के बाहर आने वाली जमीन को छोड़ने के लिए सीमावर्ती निवासी किसी भी हाल में तैयार नहीं हैं। उन्होंने सरकार पर सीमावर्ती इलाकों के लोगों के प्रति "सौतेला व्यवहार" अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि इस समस्या के समाधान के लिए बार-बार अनुरोध किए जाने के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

सीसीआईबी ने मुआवजे के मुद्दे पर भी गंभीर आपत्ति जताई। समिति के अनुसार, भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 के तहत 150 गज (137.4 मीटर) भूमि के लिए मुआवजा दिया जाना चाहिए, लेकिन व्यवहार में केवल 11 मीटर भूमि का ही मुआवजा दिया जा रहा है। जिसमें तीन मीटर बाड़बंदी और आठ मीटर सड़क के लिए हैं। इसे समिति ने सीमावर्ती लोगों के साथ "घोर अन्याय" बताया।

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