सुकमा , जनवरी 19 -- छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के कोंटा विकासखंड अंतर्गत पेद्दाकुरती गांव में प्रस्तावित केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) कैंप के विस्तार के लिए कृषि भूमि के अधिग्रहण की योजना का स्थानीय ग्रामीणों ने तीखा विरोध किया है। कई ग्रामीणों ने सोमवार को जिला कलेक्टर को एक लिखित आवेदन सौंपकर अपनी कृषि भूमि को कैंप विस्तार हेतु अधिग्रहित न करने की गुहार लगाई।

ग्रामीणों ने कहा कि इससे उनकी आजीविका के एकमात्र साधन पर संकट गहराएगा। ग्रामीणों ने आवेदन में स्पष्ट किया कि पेद्दाकुरती गांव में अधिकांश परिवारों के पास सीमित कृषि भूमि ही है, जिस पर वे खेती करके अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। उन्होंने याद दिलाया कि पहले चरण में कैंप स्थापना के लिए जमीन दिए जाने के बाद भी ग्रामीणों ने सुरक्षा हित में सहयोग किया था, जिससे क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हुई और नक्सली घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आई है। हालांकि, अब कैंप के विस्तार के लिए दोबारा उनकी जमीन मांगे जाने से उनके सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट पैदा हो गया है।

ग्रामीण हिरमा कवासी ने बताया, "हमारे पास पहले से ही बहुत कम जमीन बची है। पहले कैंप के लिए हमने जमीन दी, अब अगर बाकी जमीन भी चली गई तो हम अपने परिवार का पेट कैसे भरेंगे? हमारे पास खेती के अलावा कोई दूसरा रोजगार नहीं है।" इसी प्रकार ग्रामीण मड़कम सेसा ने कहा, "हम सुरक्षा बलों का सम्मान करते हैं और शांति चाहते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हमारा अस्तित्व ही मिटा दिया जाए।"ग्रामीणों ने अपनी बात रखते हुए कहा कि वे देश की सुरक्षा के महत्व को समझते हैं, लेकिन सरकार को भी उनकी आजीविका के साधनों के संरक्षण पर विचार करना चाहिए। उन्होंने कलेक्टर से स्पष्ट अनुरोध किया कि सीआरपीएफ कैंप के विस्तार के लिए किसी अन्य शासकीय भूमि या गैर-कृषि भूमि का चयन किया जाए। उनका प्रस्ताव है कि आसपास के वन या अनुपयोगी शासकीय भूमि पर कैंप का विस्तार किया जा सकता है, जिससे न तो सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित होगी और न ही ग्रामीणों की रोजी-रोटी पर संकट आएगा।

इस मामले में ग्रामीणों के साथ बस्तरिया राज मोर्चा के सुकमा जिला सचिव राम सोढ़ी भी मौजूद रहे। उन्होंने कहा कि आदिवासी अंचलों में विकास और सुरक्षा की परियोजनाओं को लागू करते समय स्थानीय लोगों के हितों और अस्तित्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने प्रशासन से मांग की कि ग्रामीणों की चिंताओं को गंभीरता से लेते हुए एक संतुलित और मानवीय समाधान निकाला जाए।

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