हैदराबाद , जुलाई 10 -- शुष्क भूमि पर होने वाली खेती के स्वरूप को बदलने के लिए वैश्विक सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आगामी 10 से 12 सितंबर तक नयी दिल्ली में शुष्क भूमि कांग्रेस 2026 का आयोजन किया जायेगा।

गौरतलब है कि शुष्क भूमि दुनिया की भूमि सतह का लगभग 47 प्रतिशत हिस्सा है और 2 अरब 30 करोड़ से अधिक लोगों का भरण-पोषण करती है। यह क्षेत्र बार-बार पड़ने वाले सूखे, जलवायु परिवर्तनशीलता, मिट्टी के क्षरण, कम उत्पादकता और कमजोर आजीविका जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिसके लिए बड़े पैमाने पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है।

इस कांग्रेस का उद्देश्य शुष्क भूमि कृषि के लिए बड़े पैमाने पर अपनाई जा सकने वाली नई खोजों और तकनीकों का प्रदर्शन करना, दक्षिण-दक्षिण तकनीकी सहयोग को मजबूत करना, साझेदारी और निवेश को बढ़ावा देना, शुष्क भूमि परिवर्तन के लिए एक वैश्विक दक्षिण कार्य रूपरेखा विकसित करना, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा नवाचार शासन को बढ़ाना और कृषि विकास में महिलाओं एवं युवाओं को शामिल करने वाले दृष्टिकोण को बढ़ावा देना है।

अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के लिए अंतर्राष्ट्रीय फसल अनुसंधान संस्थान (इक्रीसैट) और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) दक्षिण-दक्षिण सहयोग के माध्यम से संयुक्त रूप से इस सम्मेलन का आयोजन करेंगे।

यहां स्थित इक्रीसैट संस्थान के अनुसार, इस 3 दिवसीय सम्मेलन में एशिया, अफ्रीका, लाटिन अमेरिका और प्रशांत क्षेत्रों के देशों के नीति निर्माता, वैज्ञानिक, विकास भागीदार, वित्तीय संस्थान, निजी क्षेत्र के प्रतिनिधि और किसान संगठन शामिल होंगे। यह आयोजन 12 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र के दक्षिण-दक्षिण सहयोग दिवस के अवसर पर हो रहा है।

संस्थान के अनुसार, यह सम्मेलन विकासशील देशों में प्रमाणित कृषि नवाचारों को साझा करने के लिए एक मंच के रूप में कृषि में दक्षिण-दक्षिण सहयोग के लिए इक्रीसैट उत्कृष्टता केंद्र का भी उपयोग करेगा।

सम्मेलन में विचार-विमर्श के लिए छह क्षेत्रों की पहचान की गई है, जिनमें जलवायु-अनुकूल फसल प्रजनन, सतत शुष्क भूमि कृषि प्रणाली, जलवायु-अनुकूल परिदृश्य, बीज प्रणाली, पोषण और बाजार, तथा महिला एवं युवा-केंद्रित कृषि परिवर्तन शामिल हैं।

यह आयोजन आईसीएआर और इक्रीसैट के बीच सहयोग के 50 वर्ष पूरे होने का भी जश्न मनाएगा, जिसके तहत जलवायु-अनुकूल फसल विकास, बीज प्रणाली और छोटे किसानों के लिए उत्पादकता बढ़ाने की उपलब्धियों को दर्शाया जाएगा, साथ ही भारत के विकसित भारत 2047 के दृष्टिकोण के अनुरूप विज्ञान-संचालित रोडमैप तैयार किया जाएगा।

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