अमृतसर , जुलाई 10 -- पंजाब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रवक्ता एवं सिख चिंतक प्रो.सरचंद सिंह ख्याला ने सिख योद्धाओं और शहीदों के जीवन पर आधारित फिल्मों को लेकर अलग-अलग रुख अपनाये जाने पर सवाल उठाते हुए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) और श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज से स्पष्ट और एक समान नीति सार्वजनिक करने की मांग की है।
प्रो. ख्याला ने शुक्रवार को जारी बयान में कहा कि 28 दिसंबर 2025 को श्री अकाल तख्त साहिब की ओर से जारी निर्देश में सिख गुरुओं, उनके परिवार, सिख योद्धाओं, शहीदों और सिख परंपराओं पर फिल्म या एनीमेशन बनाये जाने पर आपत्ति जतायी गयी थी। उन्होंने कहा कि इसी आधार पर मई 2026 में मुंबई स्थित भंसाली स्टूडियोज लिमिटेड की ओर से सिख सेनापति सरदार हरि सिंह नलवा के जीवन पर फिल्म बनाने के प्रस्ताव को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया गया था कि वह प्राचीन सिख योद्धाओं की श्रेणी में आते हैं। उन्होंने कहा कि उक्त निर्देश में प्राचीन और आधुनिक सिख योद्धाओं या शहीदों के बीच कोई अंतर नहीं किया गया है। ऐसे में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि यदि प्राचीन सिख योद्धाओं पर फिल्म बनाना अनुचित माना जाता है तो आधुनिक शहीदों और योद्धाओं पर आधारित फिल्मों का समर्थन किस आधार पर किया जा रहा है।
प्रो. ख्याला ने कहा कि जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह ने मानवाधिकार कार्यकर्ता शहीद जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित फिल्म 'सतलुज' पर लगाये गये प्रतिबंध को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक बताया था और इसके प्रदर्शन की मांग की थी। वहीं एसजीपीसी ने भी फिल्म पर प्रतिबंध का विरोध करते हुए पंजाब के राज्यपाल के नाम उपायुक्तों के माध्यम से ज्ञापन सौंपे हैं। उन्होंने कहा कि सिख समुदाय यह जानना चाहता है कि सिख योद्धाओं और शहीदों के फिल्मी चित्रण को लेकर अंतिम और अधिकृत नीति क्या है।
प्रो ख्याला ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि वर्ष 1934 में एसजीपीसी की धार्मिक सलाहकार समिति ने सिख गुरुओं, शहीदों और महान हस्तियों के जीवन पर फिल्म निर्माण को सिख सिद्धांतों के विरुद्ध माना था, लेकिन 1940 में इस नीति में संशोधन करते हुए स्पष्ट किया गया कि प्रतिबंध केवल अकाल पुरख, दसों सिख गुरुओं, उनकी पत्नियों, साहिबजादों और श्री गुरु ग्रंथ साहिब के चित्रण तक सीमित रहेगा।
उन्होंने दावा किया कि 10 जुलाई 2003 और 13 दिसंबर 2022 को जारी एसजीपीसी की व्याख्याओं में भी केवल सिख गुरुओं, उनके परिवार और पंज प्यारे के पात्रों के चित्रण पर रोक का उल्लेख है, जबकि सिख योद्धाओं और शहीदों के चित्रण पर कोई स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है।
प्रो. ख्याला ने जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह से 2025 के निर्देश पर पुनर्विचार करने की अपील करते हुए कहा कि 'सतलुज', 'मस्ताने' और सारागढ़ी के युद्ध पर आधारित फिल्मों ने युवा पीढ़ी को सिख इतिहास और वीरता से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। उन्होंने कहा कि सरदार हरि सिंह नलवा और अन्य पंथ-स्वीकृत सिख हस्तियों पर शोध आधारित एवं गरिमापूर्ण फिल्में इतिहास, राष्ट्रीय चेतना और सिख विरासत को विश्व स्तर पर पहुंचाने का प्रभावी माध्यम बन सकती हैं।
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