प्रयागराज , अगस्त 17 -- उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में सावन के प्रत्येक सोमवार को धार्मिक आस्था के साथ-साथ सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा 'गहरेबाजी' का भी आयोजन किया जाता है। सोमवार को नैनी के अरैल क्षेत्र में यमुना तट के निकट आयोजित पारंपरिक इक्का दौड़ प्रतियोगिता में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लेकर इस अनूठी विरासत का आनंद लिया। प्रयागराज में सावन के सोमवारों पर इक्का दौड़ आयोजित करने की वर्षों पुरानी परंपरा है। स्थानीय भाषा में 'गहरेबाजी' के नाम से प्रसिद्ध इस प्रतियोगिता में केवल घोड़ों की गति ही नहीं, बल्कि उनकी चाल, संतुलन और प्रदर्शन कौशल का भी विशेष महत्व होता है।
प्रतियोगिता में विभिन्न नस्लों के घोड़ों ने अपनी पारंपरिक चालों का प्रदर्शन किया। चौटाला चाल, दुगामा चाल, सिंधी चाल और माधुरी चाल ने दर्शकों का विशेष ध्यान आकर्षित किया। सिंधी नस्ल के घोड़े अपनी संतुलित और आकर्षक चाल के लिए खास तौर पर सराहे गए। इस अवसर पर 'उड़ान' और 'हीरा' नामक घोड़ों ने अपने शानदार प्रदर्शन से दर्शकों की खूब वाहवाही बटोरी। आयोजन स्थल पर मौजूद लोगों ने तालियों और उत्साह के साथ प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन किया।
स्थानीय लोगों का कहना है कि गहरेबाजी केवल एक खेल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि प्रयागराज की सांस्कृतिक पहचान और विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह परंपरा वर्षों से सावन के अवसर पर आयोजित होती आ रही है और आज भी लोगों के बीच उतनी ही लोकप्रिय है।
उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक धरोहर और लोक परंपराओं से जोड़ने का कार्य करते हैं। धार्मिक आस्था और लोक संस्कृति के इस अनूठे संगम ने सावन के माहौल को और अधिक आकर्षक बना दिया।
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