लखनऊ , नवम्बर 06 -- सारनाथ स्थित मूलगंध कुटी विहार की 94वीं वर्षगांठ के पावन अवसर पर भगवान बुद्ध के पवित्र अस्थि अवशेषों को दर्शनार्थ रखा गया। इस अवसर पर देश-विदेश से आए हजारों बौद्ध श्रद्धालुओं ने तथागत भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों के दर्शन कर आत्मिक शांति और आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति प्राप्त की।

इस अवसर पर कार्तिक पूर्णिमा के दिन सारनाथ की पावन धरती पर भव्य शोभायात्रा का भी आयोजन किया गया, जिसमें भारत के विभिन्न राज्यों के अलावा थाईलैंड, कंबोडिया, वियतनाम, म्यांमार, श्रीलंका, भूटान, नेपाल और लाओस से आए बौद्ध अनुयायियों ने भाग लिया।

उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि हर वर्ष कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर सारनाथ में भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेषों को दर्शनार्थ रखा जाता है, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं तीर्थयात्री पहुंचते हैं। इस वर्ष तीन दिवसीय (03 से 05 नवम्बर) आयोजन में श्रद्धालुओं की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में लगभग दोगुनी रही। इस अवसर पर श्रद्धालु न केवल बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले देशों से बल्कि कोलकाता, गुजरात, बिहार, लद्दाख, उत्तर प्रदेश और हिमालयी क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में पहुंचे।

उन्होंने बताया कि आयोजन का सफल संचालन महाबोधि सोसायटी ऑफ इंडिया, सारनाथ केंद्र और वियतनामी बौद्ध संघ के सहयोग से किया गया। श्रद्धा और भक्ति के इस आयोजन में देश-विदेश से आए लगभग 22,000 से अधिक श्रद्धालुओं ने भगवान बुद्ध के पवित्र अस्थि अवशेषों के दर्शन किए। विदेशी श्रद्धालुओं में सर्वाधिक भागीदारी श्रीलंका और वियतनाम से रही।

पर्यटन मंत्री ने कहा कि सारनाथ वही पुण्य भूमि है जहां भगवान बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश धर्मचक्र प्रवर्तन दिया था। उन्होंने बताया कि भगवान बुद्ध के पिपरहवा अवशेषों की भारत वापसी से बौद्ध श्रद्धालुओं में नई ऊर्जा और आस्था का संचार हुआ है। इस ऐतिहासिक घटना को 127 वर्ष बाद संभव बनाने के लिए केंद्र सरकार का विशेष आभार व्यक्त किया गया।

महाबोधि सोसायटी ऑफ इंडिया के प्रधान भिक्षु भंते सुमिथानंद थेरो ने इसे "अत्यंत हर्ष और आध्यात्मिक गौरव का क्षण" बताया। उन्होंने कहा कि इस वर्ष सारनाथ में पवित्र अवशेषों के दर्शन करने वालों की संख्या ऐतिहासिक रही, जिससे उत्तर प्रदेश की पहचान एक वैश्विक बौद्ध पर्यटन केंद्र के रूप में और सशक्त हुई है।

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