कोच्चि , मई 09 -- युवा पीढ़ी में एकता, अनुशासन और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए विश्व हिंदू परिषद के अखिल भारतीय संयुक्त महामंत्री जी. स्थानुमलयन ने कहा कि केरल के हिंदू युवाओं को समाज के सामने आ रही बढ़ती सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करने के लिए धर्म के आधार पर खुद को संगठित करना चाहिए।
एलामक्कारा के सरस्वती विद्यानिकेतन पब्लिक स्कूल में आयोजित दुर्गा वाहिनी शौर्य प्रशिक्षण वर्ग के समापन समारोह को संबोधित करते हुए श्री स्थानुमलयन ने कहा कि केरल में हिंदू समाज का अस्तित्व, शक्ति और भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि हिंदू युवा कितनी दृढ़ता, समर्पण और साहस के साथ एकजुट हो पाते हैं।
उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक मूल्यों को बनाए रखने और समाज की स्थिरता तथा निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए धर्म में निहित संगठित युवा शक्ति ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि उभरती चुनौतियों का प्रभावी ढंग से जवाब देने के लिए हिंदू युवाओं को वैचारिक स्पष्टता, आत्मविश्वास, अनुशासन और सामाजिक ज़िम्मेदारी की भावना विकसित करनी चाहिए।
विहिप नेता ने कहा कि युवा पीढ़ी को राष्ट्र निर्माण और समाज सेवा की गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेते हुए भी धर्म के सिद्धांतों और मूल्यों से मज़बूती से जुड़े रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज को मज़बूत बनाने और विभाजनकारी प्रवृत्तियों पर काबू पाने के लिए एकता और सामूहिक प्रयास ज़रूरी हैं।
दुर्गा वाहिनी शौर्य प्रशिक्षण शिविर के समापन समारोह में स्वयंसेवकों, आयोजकों और आम लोगों ने बड़े उत्साह के साथ भाग लिया। समापन कार्यक्रमों के हिस्से के तौर पर एक औपचारिक मार्च और शारीरिक प्रदर्शन आयोजित किया गया, जिसमें प्रतिभागियों द्वारा शिविर के दौरान सीखे गए अनुशासन, साहस, आत्मविश्वास और प्रशिक्षण कौशल का प्रदर्शन किया गया।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्ध त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. नंदिनी नायर ने कहा कि महिला सशक्तिकरण का असली मतलब जागरूकता, शिक्षा और उचित प्रशिक्षण के माध्यम से महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में लाना है।
उन्होंने बताया कि शिक्षा ही सशक्तिकरण की नींव है और इस बात पर ज़ोर दिया कि लड़कियों को पढ़ाई में बेहतरीन प्रदर्शन करने, रोज़गार के अवसर पाने और आत्मनिर्भर बनने की कोशिश करनी चाहिए। उनके अनुसार, महिलाओं को समाज में सार्थक योगदान देने के लिए न केवल बौद्धिक रूप से, बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी सक्षम होना चाहिए।
डॉ. नायर ने कहा कि मौजूदा सामाजिक और आर्थिक हालात ऐसे हैं कि परिवारों की आर्थिक सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए पुरुषों और महिलाओं, दोनों को मिलकर समान रूप से काम करने की ज़रूरत है। उस पारंपरिक सोच का ज़िक्र करते हुए कि "जहाँ महिलाओं का सम्मान और पूजा होती है, वहाँ दैवीय शक्तियाँ निवास करती हैं," उन्होंने जीवन के सभी क्षेत्रों में महिलाओं को गरिमा, अवसर और पहचान देने के महत्व पर ज़ोर दिया।
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